भारतवर्ष में ऐसे कई स्थान हैं, जहां कई धर्मों के लोगों की आस्था समान रूप से बनी रहती है। ऐसे ही ‘अजमेर शरीफ’ की दरगाह पर हिंदू और मुस्लिम समान रूप से मन्नत मांगते हैं। राजस्थान के अजमेर जिले में स्थित ‘ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती’ की कब्र लाखों लोगों की आस्था का केंद्र है।

जयपुर से तकरीबन 135 किलोमीटर दूर अरावली की पहाड़ियों से घिरे अजमेर शहर में यह स्थित है। गंगा-जमुनी संस्कृति की अद्भुत मिसाल माने जाने वाली इस मजार पर प्रत्येक मजहब के लोग अपनी मुराद पूरी करने आते हैं।

आप इसकी महत्ता इस बात से ही समझ लीजिए कि यहां पर पंडित जवाहरलाल नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी, अटल बिहारी वाजपेई, यहां तक कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा तक ने अपना मत्था टेका है। अभी यहां तमाम बड़ी सेलिब्रिटीज जो हर फील्ड से जुड़ी होती हैं, प्रत्येक वर्ष अपना मत्था टेकने आती हैं।

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कहा जाता है कि इस दरगाह का निर्माण ‘सुल्तान गयासुद्दीन खिलजी’ द्वारा किया गया, तो बाद में इसका विकास सम्राट हुमायूं द्वारा किया गया। बेहद आकर्षक और भव्य मकबरे में ‘ख्वाजा गरीब नवाज’ के नाम से प्रार्थना की जाती है। कहते हैं कि ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती इस्लामिक विद्वान एवं फिलॉसफर होने के साथ सूफी संत भी थे। भारत में उन्हें इस्लाम का ‘फाउंडर’ भी कहा जाता है। माना जाता है कि 1192 से 1255 ईस्वी के बीच वह मदीना से भारत आए थे। कुछ दिनों के लिए वह दिल्ली में रुके फिर बाद में वह लाहौर चले गए और और अंत में ‘मुइज्ज़ अल- दिन मुहम्मद’ के साथ अजमेर आए थे।

बाद में इसी स्थान को उन्होंने अपना निवास बना लिया। कहते हैं कि ख्वाजा ‘मोइनुद्दीन हसन चिश्ती’ के पास कई सारी पारलौकिक शक्तियां थी, लेकिन इससे महत्वपूर्ण यह है कि इस संत ने हिंदू मुस्लिमों को मिलजुल कर रहने का ज्ञान दिया। तकरीबन 114 वर्ष की उम्र में उन्होंने 6 दिन तक खुद को एक कमरे में बंद कर अपना शरीर त्याग दिया और बाद में उसी स्थान पर उनके नाम से मकबरा बनाया गया।

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वहीँ 1465 ईस्वी में ‘गयासुद्दीन खिलजी’ द्वारा अजमेर शरीफ की दरगाह का निर्माण कराया गया। बेहद भव्य एवं आकर्षक दरवाजे इस मजार पर निर्मित किये गए हैं जिसे निजाम गेट, जन्नती दरवाजा, नक्कारखाना और बुलंद दरवाजा कहा जाता है।

मुगलकालीन वास्तुकला की बेहतरीन नमूने के रूप में जाने जाने वाली यह मस्जिद बेहद आकर्षक मानी जाती है। प्रत्येक दरवाजे की अपनी खासियत है तो यहां स्थित और भी कई मकबरे और मस्जिदें प्रसिद्ध हैं, जिनमें चार यार की मजार, अकबरी मस्जिद, सेहन का चिराग, महफिल खाना या शाम खाना बेहद प्रसिद्ध है।

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ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की मृत्यु की तिथि पर यहां ‘उर्स’ मनाया जाता है। जहां अल्लाह के बन्दों द्वारा गर्म जलते कढ़ाई के अंदर खड़े होकर भक्तों को प्रसाद वितरित किया जाता है। यह 6 दिन का वार्षिक उत्सव होता है जो मुईनुद्दीन चिश्ती के अपने अंतिम दिनों में 6 दिन कमरे में बंद करने की याद से संबंधित है।

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