दुनिआ की सर्वश्रेष्ठ सेनाओं की बात की जाये तो उनमें भारतीय सेना का नाम शान से लिया जाता है। भारतीय सेना के सन्दर्भ में देशभक्ति का जज्बा और कुछ कर गुजरने की ललक वाली कई कहानियां आपने सुनी होंगी। लेकिन अपनी मौत के सालों बाद भी भारत-चीन बॉर्डर के पास नाथुला दर्रे पर बाबा हरभजन सिंह आज भी सीमाओं की रक्षा करते हैं। आप कहेंगे कि यह किस प्रकार मुमकिन है! तो आइए आपको ऐतिहासिक तथ्य सुनाते हैं.

30 अगस्त 1946 को गुजरांवाला जिला जो अब पाकिस्तान में है, उस जिले के सदराना गांव में बाबा हरभजन का जन्म हुआ था। देश की आजादी हुई और सीमाओं का बंटवारा हुआ। तत्पश्चात 1956 में भारतीय सेना में बाबा हरभजन सिंह भर्ती हो गए। बताते चलें कि 1965 में 30 जून को इन्हें कमीशन भी मिल गया और यह 14 राजपूत रेजीमेंट में शामिल कर लिए गए। तत्पश्चात 1965 के इंडो-पाक वार में भी यह शामिल रहे थे।

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1968 में 23 मई को पंजाब रेजीमेंट के साथ पूर्वी सिक्किम में बाबा हरभजन सिंह तैनात थे। इसी साल 4 अक्टूबर को घोड़ों के काफिले को ले जाते समय वो एक गहरी खाई में जा गिरे और तभी इनकी मौत हो गई थी। इनकी रेजीमेंट के सैनिकों ने इनको ढूंढा, लेकिन वो कहीं नहीं मिले। कहा जाता है कि उसके बाद अपने एक साथी सिपाही के सपने में आकर इन्होंने अपनी मौत की जानकारी दी और ठीक उसी जगह पर इनका शव मिला, जो इन्होंने सपने में बताया था।

यह भी कहा जाता है कि बाबा हरभजन सिंह के सपने के अनुसार सेना के अधिकारियों ने एक समाधि का निर्माण भी कराया। उसके बाद 1982 में उसी स्थान पर एक मंदिर बना। बाबा हरभजन सिंह मेमोरियल के नाम से जाने जाने वाला यह मंदिर गंगतोक से 52 किलोमीटर दूर नाथूला और जेलेप्ला पास के बीच काफी ऊंचाई पर स्थित है। बाबा हरभजन सिंह का सैनिकों वाला सारा साजो समान, वर्दी उनके जूते इत्यादि इस मंदिर में रखे हुए हैं।

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दिलचस्प बात यह है कि मौत के बाद भी बाबा हरभजन सिंह बॉर्डर पर निगरानी करते हैं। कई ऐसे मौके आए हैं जब उन्होंने घुसपैठ के बारे में भारतीय सैनिकों को सतर्क किया है। संभवतः इसीलिए भारतीय सेना उन्हें पेंशन देती है और उनकी पदोन्नति भी मरने के बाद की गई है। बकायदा उनको सैनिकों की तरह 2 महीने की छुट्टी प्रदान की जाती है और रेलवे के माध्यम से उनके गांव तक उनके साजो-सामान को पहुंचाया जाता है।

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ऐतिहासिक कहानियों में यह कहानी बेहद प्रेरक और दिलचस्प बताई जाती है। एक सच की तरह वर्तमान में यह कथा आज भी उतनी ही सजीव है जितनी पहले थी। एक सैनिक की अपने देश के प्रति कुछ कर गुजरने के जज्बे ने उसे मरने के बाद भी देश सेवा में तत्पर बनाये रखा। आपको यह ऐतिहासिक कहानी कैसी लगी कमेंट बॉक्स में अवश्य बताएं।

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