हमारे भारत ने दुनिया को बहुत कुछ दिया है और उनमें से ही एक ‘जीरो’ का आविष्कार भी है। जीरो की खुद में तो कुछ अहमियत नहीं होती है, लेकिन अगर वह किसी संख्या के पीछे लग जाए तो उसकी कीमत कई गुना बढ़ा देता है। पर इसकी उत्पत्ति कहां हुई, उसकी कहानी बेहद दिलचस्प है। आइए जानते हैं-

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से आर्यभट्ट को शून्य का आविष्कारक माना जाता है। इनका जन्म 476 ईसा पूर्व हुआ था। आर्यभट्ट ने ‘नागार्जुन’ की थ्योरी पर आधारित एक से अरब तक की संख्या को बताया और लिखा ‘स्थाना स्थानम दश गुणम स्यात’ इसका अभिप्राय है कि प्रत्येक अगली संख्या पिछली से 10 गुनी अधिक है।

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इसके बाद सातवीं शताब्दी के दौरान ब्रह्मगुप्त द्वारा शून्य सहित दूसरे अंकों पर एक्सपेरिमेंट किए गए और तब कंबोडिया से चीन और बाद में अरब कंट्रीज में शून्य का प्रचार प्रसार हुआ। यूरोप की बात करें तो यहां 12वीं शताब्दी में शून्य पहुंचा।

परंतु आर्यभट्ट से पहले ही भारत में लाखों करोड़ों वर्षों से शून्य का प्रयोग होता रहा है। रामायण में वर्णित रावण के 10 सिर या कौरवों की संख्या 100 हम सब जानते हैं। कहते हैं आर्यभट्ट ने सिर्फ इस पद्धति को दुनिया के सामने रखा क्योंकि कई हजार साल पुराने संस्कृत के विभिन्न दस्तावेजों में शून्य और दशमलव का इस्तेमाल सामान्य रूप से किया जाता था।

यह बात तकरीबन 1200 से 600 ईसा पूर्व की है। फिर इसका वर्णन ‘माया सभ्यता’ के दौरान और ‘सिंधु घाटी सभ्यता’ के दौरान मिलता है। कई शोधकर्ता यह कहते हैं कि भारत में शून्य की खोज उत्तर वैदिक काल में ही हो गई थी।

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यह समय 1000 से 600 ईसा पूर्व का था और इसी दौरान तमाम वेदों अथर्व, यजुर, शाम और दूसरे उपनिषदों की रचना हुई। इन सभी में शून्य और दशमलव का प्रयोग वर्णित है।

इसके अतिरिक्त भारत में बौद्ध काल के दौरान भी मंदिरों पर शून्य के अंकित चिन्ह मिलने की पुष्टि हुई है। बौद्ध काल के दौरान ही तमाम संवादों में शून्य का प्रयोग वर्णित हुआ है। इसमें बौद्ध के ही समकालीन बौद्ध भिक्षु ‘विमल कीर्ति’ और ‘मंजूश्री’ के बीच का संवाद बेहद प्रसिद्ध है। इसके अतिरिक्त तकरीबन 500 ईसा पूर्व भारत में छंद शास्त्र के प्रणेता पिंगला चार्य को द्विअंकीय गणित का पिता माना जाता है।

अगर इस सिद्धांत के अनुसार चलें तो शून्य की खोज 200 वर्ष पुरानी मानी जा सकती है। कहते हैं गुप्त काल के दौरान यह प्रणाली पूरी तरह से प्रयोग में लाई जाने लगी थी। बाद में शालीवाहन नरेश के काल में नागार्जुन ने शून्यवाद का वर्णन किया। ‘लोक विभाग’ शून्यवाद बौद्धों के महायान शाखा का एक बेहद महत्वपूर्ण माध्यमिक का सिद्धांत माना जाता है। इसके अनुसार समस्त संसार शून्य है और उसके सब पदार्थ सत्ताहीन हैं।

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इसका वर्णन 166 से 199 ईसवी के बीच जैन हस्तलिपि ‘लोक विभाग’ में वर्णित है।

ऐसे एक नहीं हजारों उदाहरण हैं, जिससे स्पष्ट होता है कि भारत में ही शून्य का आविष्कार हुआ और बाद में समस्त दुनिया ने इस प्रणाली को अपनाया।

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