अंडरवर्ल्ड की दुनिया भी बड़ी विचित्र होती है। इसमें कब कौन उभरता है और कब किस हस्ती का सूरज डूब जाता है, यह आम लोगों को पता भी नहीं चलता!

मुंबई में विभिन्न आपराधिक सरगनाओं के उभार की कहानी कोई नई नहीं है। यहां तमाम अपराधियों ने अपना सर उठाया है तो तमाम अपराधियों को मौत की नींद भी सोनी पड़ी है। इसी कड़ी में डॉन हाजी मस्तान की कहानी आती है, जिसे आधुनिक रूप में संगठित अपराध करने वाला पहला व्यक्ति माना जाता है। आइए जानते हैं इसकी कहानी को-

हाजी मस्तान मूलतः तमिलनाडु से मात्र 8 साल की उम्र में ही बांबे आ गया था। पहले वह साइकिल का पंचर बनाने और कुली का काम करने लगा। फिर 1944 के आसपास उसने ₹5 पर मुंबई टॉप में माल ढुलाई की नौकरी भी की थी। जाहिर तौर पर वह कुछ पढ़ाई नहीं कर पाया था। ठीक इसी समय मुंबई एक बिजनेस सेंटर के रूप में उभर रहा था और समुद्र के रास्ते तस्करी भी शुरू हो गई थी।

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तत्कालीन समय में कई व्यापारी सोना, चांदी और महंगी विदेशी घड़ियों की स्मगलिंग करते थे। बस यहीं से हाजी मस्तान संगठित अपराध की दुनिया में प्रवेश करने लगा था। इन स्मगल किए गए सामानों को वह सुरक्षित ढंग से बाहर निकालने लगा था और इस तरीके से व्यापारी उसे अपनी आय का कुछ हिस्सा दे देते थे। इस काम में आगे सोने के बिस्किट भी जुड़ गए, जिसकी तस्करी करते समय हाजी मस्तान को 4 साल की सजा भी हुई थी। बाद में इस तरह के धंधे के दौरान हाजी मस्तान की मुलाकात दमन के कुख्यात स्मगलर सुकुर नारायण बखिया से हुई और काली दुनिया में फिर हाजी मस्तान का नाम आदर से लिया जाने लगा।

कहा जाता है कि हाजी मस्तान बेहद रंगीन मिजाज का आदमी था और मशहूर फिल्म अभिनेत्री मधुबाला के दीवानों में से एक था। हालांकि वह मधुबाला को अपने इश्क बारे में बता नहीं पाया, क्योंकि मधुबाला बहुत जल्दी ही दुनिया से चल बसी थीं। बाद में मधुबाला की तरह दिखने वाली एक और लड़की शाहजहां बेगम बॉलीवुड में आई और इस बार हाजी मस्तान ने देरी नहीं की और पहले प्रेम और बाद में दोनों ने शादी कर ली थी।

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इमरजेंसी के दौरान न केवल बड़े नेता बल्कि हाजी मस्तान ने भी जेल में 18 महीने से अधिक समय बिताया और इसके बाद जब वह जेल से छूटा तो जयप्रकाश नारायण के सानिध्य में उसने अपराध की दुनिया को अलविदा कहने का मन बनाया। बाद में वह हज यात्रा पर गया और यहीं से उसका नाम हाजी मस्तान पड़ गया।

धीरे-धीरे वह सोशल वर्क से जुड़ने लगा और बाद में समाज के कमजोर वर्गों के लिए वह मसीहा के रूप में उभरा। राजनीति में उसका झंडा कुछ ज्यादा ऊँचा नहीं उठ पाया, लेकिन हाजी मस्तान के बारे में कहा जाता है कि वह बिना कोई खून खराबा किये मुंबई का डॉन बनने में सफल रहा और यही उसकी खासियत भी रही।
जब तक वह मुंबई के अपराध को नियंत्रित करता रहा तब तक कोई ख़ास खून खराबा नहीं हुआ। आपको इस डॉन की कहानी कैसी लगी, कमेंट बॉक्स में अवश्य बताएं।

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