भारतीय सैन्य इतिहास में परमवीर-चक्र सैनिकों को दिया जाने वाला सबसे बड़ा सम्मान है। इसे भारत के चंद सैनिक ही हासिल कर पाए हैं और उनमें एक नाम मेजर शैतान सिंह का है। मेजर शैतान सिंह ने परमवीर-चक्र चीन के खिलाफ अपनी लड़ाई में पाया और इसी बात से उनकी अहमियत साबित हो जाती है।

कहा जाता है कि मात्र एक छोटी सी सैनिक टुकड़ी के साथ मेजर शैतान सिंह ने सैकड़ों चीनियों को मौत के घाट उतार दिया था और एक पल के लिए लगने लगा था कि चीनी सैनिक मेजर शैतान सिंह पर काबू नहीं पा पाएंगे लेकिन वीरता दिखाते हुए यह शहीद अपना नाम इतिहास में सदा सदा के लिए अमर कर गया।

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मेजर शैतान सिंह के जीवन की बात करें तो इनका जन्म राजस्थान में 1 दिसंबर 1924 को जोधपुर में हुआ था। इनके पिता कर्नल हेम सिंह भाटी भी एक मिलिट्री ऑफिसर थे। बचपन से ही शैतान सिंह भी सैनिक बनना चाहते थे और 1 अगस्त 1949 को यह जोधपुर स्टेट फोर्स में शामिल हो गए। बाद में जब जोधपुर रियासत भारत में शामिल हुई तो यह कुमाऊँ रेजीमेंट में स्थानांतरित हो गए। इसके बाद इन्होंने नागा हिल्स ऑपरेशन में अपनी सूझबूझ का बेहतरीन इस्तेमाल किया।

कहा जाता है कि 1961 में गोवा के विलय में भी शैतान सिंह की महत्वपूर्ण भूमिका थी और इसीलिए 1962 में इन्हें मेजर का पद मिला। 1962 में ही भारत और चीन के बीच लड़ाई शुरू हो गई और मेजर शैतान सिंह कुमाऊं रेजिमेंट के कुछ सैनिकों की एक टुकड़ी लेकर लद्दाख के चुशुल सेक्टर पर तैनात हो गए। यह स्थान बेहद संवेदनशील था और चुशुल घाटी के दक्षिण-पूर्व के ‘रेजांग ला’ जो 5000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित था, वहां इनकी टुकड़ी रुकी थी।

मेजर शैतान सिंह के पास मात्र 120 सैनिक थे और इतने ठंडे स्थान पर लड़ने का उनको अभ्यास भी नहीं था। जबकि चीनी सैनिक इस स्थान से पूरी तरह से परिचित थे। भारतीय सेना को खबर मिल चुकी थी कि जल्द ही चीनी दुश्मन इस स्थान पर आक्रमण करेंगे और इसे देखते हुए मेजर शैतान सिंह ने अपने सीनियर से मदद मांगी। लेकिन सीनियर उनकी मदद कर पाने से पूरी तरह से असमर्थ थे इसीलिए उन्होंने मेजर को पीछे हटने का ऑर्डर दिया।

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कहते हैं उस वक्त पीछे हटने का विकल्प होने के बावजूद मेजर शैतान सिंह ने दो हजार से अधिक चीनी सैनिकों को रोकने का निर्णय ले लिया। यह जानते हुए भी कि उन चीनी सैनिकों को रोकना आसान नहीं होगा, जिनके पास तमाम हथियार गोला-बारूद और आधुनिक साजो समान थे।

फिर वही हुआ जो डर था! दुश्मन ने हमला किया लेकिन भारतीय सैनिक कुछ और ही ठान चुके थे और मेजर शैतान सिंह की योजना से भारतीय सैनिक चीनियों की लाश गिराने लगे। भारतीय सैनिक जान चुके थे कि उन्हें शहादत देना है, इसीलिए उनका एक सैनिक चीनियों के 10 सैनिकों के बराबर लड़ रहा था। मेजर शैतान सिंह खुद दुश्मनों से बहादुरी से लड़ रहे थे और चीनियों की लाशों को गिराने में जरा भी संकोच नहीं कर रहे थे, लेकिन तभी एक गोली उन्हें लग गई और वह जमीन पर गिर गए।

उनके सैनिक उन्हें सुरक्षित स्थान पर ले जाना चाहते थे लेकिन मेजर शैतान सिंह ने सुरक्षित स्थान पर जाने की बजाय सैनिकों को दुश्मनों से लड़ने का हुक्म दे दिया। इतना ही नहीं उन्होंने मशीनगन को रस्सी की मदद से पैरों में बंधवा लिया था। कहते हैं पैरों की मदद से वह मशीन गन चलाते रहे और दुश्मनों पर हमले करते रहे। इस तरीके से उन्होंने सैकड़ों चीनी सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया, लेकिन 18 नवंबर 1962 को खुद को शहीद होने से नहीं बचा पाए।

अगली सुबह पता चला था कि मात्र 120 भारतीय सैनिकों ने तकरीबन 1300 से अधिक चीनी सैनिकों को मार गिराया था। मेजर शैतान सिंह का शव भी दूसरे भारतीय लोगों को तभी मिला। भारत सरकार ने मेजर शैतान सिंह को इस अदम्य साहस के लिए परमवीर-चक्र से नवाजा और आने वाली पीढ़ियों ने उन्हें एक वीर को रूप में सदा सदा के लिए अपने मन मस्तिष्क में बिठा लिया।

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