अगर आपने राजा भोज के बारे में इतिहास में नहीं पढ़ा होगा तो आपने कहावत या फिल्मी गानों में जरूर सुना होगा कि “कहां राजा भोज कहां गंगू तेली”…

यह कहावत बेहद प्रचलित है, लेकिन भारतीय इतिहास का यह महान नायक सिर्फ इस कहावत का मोहताज नहीं है बल्कि वह एक महावीर महाप्रतापी राजा के तौर पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुका है। आइए जानते हैं राजा भोज की अप्रतिम कहानी को-

राजा भोज को महान सम्राट विक्रमादित्य का वंशज माना जाता है और कहते हैं कि उनके पिता राजा सिंधुराज धार राज्य के शासक रहे थे। बेहद कम उम्र, जब वह 15 वर्ष के ही थे तब उन्हें राज्य की बड़ी जिम्मेदारियां सौंपी गई थी। बाद में वह परमार वंश के राजा बने और उनके अंदर वेस्ट इंडिया में एक बड़ा साम्राज्य स्टेबल करने की इच्छा जग गयी थी। फिर कई लड़ाइयां हुई और इसी क्रम में उन्होंने 1018 के आसपास एक दूसरे राजा इंद्र को हरा दिया। फिर उन्होंने राजस्थान के राजा चाहमान वीर्यराम को भी धूल चटाई और चालूक्यों से भी लड़ाई जीती।

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अपने राज्य का विस्तार करने के साथ-साथ वह धर्म कार्य भी करते थे और ऐसे में उनकी कीर्ति बढ़ती ही जा रही थी। उनके शासनकाल में तमाम मंदिर, इमारतें और शहरों तक बनाये गए। कहा जाता है कि उज्जैन में भगवान शिव का मंदिर महाकालेश्वर, केदारनाथ, रामेश्वरम, सोमनाथ, धार की भोजशाला और भोपाल का बड़ा तालाब इसी शासक के दौर में बनवाया गया।

कहा तो यहां तक जाता है कि महमूद गजनी जिसने सोमनाथ का मंदिर ध्वस्त किया था उस पर भी राजा भोज ने हमला किया और गजनवी को अपनी जान बचाकर भागना पड़ा।

एक साहित्यकार के तौर पर भी राजा भोज ने काव्यशास्त्र में पांडित्य हासिल किया था और उन्होंने 64 प्रकार की सिद्धियों को प्राप्त किया और उन पर 84 ग्रंथों की रचना कर डाली। वास्तुशिल्प, व्याकरण, ज्योतिष, शास्त्र दर्शन, राजनीति शास्त्र इत्यादि ग्रंथ इन्हीं राजा भोज की देन माने जाते हैं।

गंगू तेली वाला कनेक्शन भी राजा भोज के साथ कैसे जुड़ा इसकी दिलचस्प कहानी सामने आती है। कहते हैं गंगू तेली का मतलब गांगेय तैलंग नामक दक्षिण के राजा से हुआ करता था। इन्होंने राजा भोज पर आक्रमण किया था लेकिन हार गए थे और यहीं से कहावत चली कि “कहां राजा भोज, कहां गांगेय तैलंग”… जो बाद में गंगू तेली बन गया। हालांकि इसके अलावा भी एकाध किम्बदंतिया प्रचलित हैं।

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कहते हैं कि राजा भोज को अंतिम युद्ध में पराजय का सामना करना पड़ा, जब गुजरात का राजा चालूक्य और चेदि नरेश की सेनाओं ने आपस में मिलकर इन पर हमला कर दिया था। राजा भोज अपनी हार के कुछ ही समय बाद स्वर्ग सिधार गए लेकिन अपने शासनकाल में किए गए कार्यों के कारण उन्हें हमेशा इतिहास में याद रखा जाएगा, इस बात में दो राय नहीं।

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