भारतवर्ष में एक से बढ़कर एक धनाढ्य लोग हुए हैं और उन्होंने विभिन्न अवसरों पर अपने धन का सदुपयोग भी किया है। हैदराबाद के निजाम मीर उस्मान अली को अक्सर यह कह कर कोसा जाता है कि वह आजादी के समय भारत की बजाय पाकिस्तान के साथ जाना चाहते थे!

किंतु आप यह जानकर आश्चर्य करेंगे कि यही मीर उस्मान अली 1965 के भारत पाकिस्तान के युद्ध के दौरान अपना खजाना भारत सरकार को देने में जरा भी नहीं हिचके। आइए जानते हैं इनकी कहानी को-

उस्मान अली के बारे में आप यही जान लीजिए कि 1937 में टाइम मैगजीन ने उन्हें अपने कवर पेज पर स्थान दिया था। इनकी रईसी के चर्चे कुछ यूं समझिए कि तत्कालीन समय में अमेरिका की कुल जीडीपी के 2% के बराबर इनकी रियासत की संपत्ति थी और तकरीबन पांच करोड़ पाउंड के हीरे का इस्तेमाल यह एक पेपरवेट के तौर पर करते थे। जाहिर तौर पर उनके पैलेस में तमाम लोग कार्य करते थे और एक अनुमान के मुताबिक यह संख्या तकरीबन 6000 से अधिक थी।

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उस्मान अली की बात की जाए तो वह एक टोपी और एक पुराना कंबल ओढ़ कर अपनी जिंदगी गुजार दिए थे। यह भी कहा जाता है कि बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के लिए भी मीर उस्मान अली ने अच्छा खासा पैसा दान में दिया था। अब प्रश्न उठता है कि उन्होंने भारत सरकार के खजाने को कब दान दिया?

आजादी के 10-15 साल बाद तक भारत का समय बेहद तनाव के रूप में गुजरा था। 1962 में चीन द्वारा भारत को हार मिली थी। वहीं 1965 में पाकिस्तान के साथ युद्ध में भारत को उलझना पड़ा। हालांकि 1965 में पाकिस्तान को भारत धूल चटाने में सफल रहा, लेकिन युद्ध के बाद जैसा कि होता है सरकार की हालत भी जर्जर हो गई थी और ठीक इसी समय चीन ने भी तिब्बत को लेकर दादागिरी शुरू कर दी थी।

जाहिर तौर पर भारत के पास तमाम सैन्य साजो सामान की कमी महसूस हो रही थी और ठीक इसी वक्त लाल बहादुर शास्त्री ने भारतीय सेना के लिए भारतीय रक्षा कोष की स्थापना की। इस रक्षा कोष में आम से लेकर खास तक तमाम लोग दान देने के लिए उत्सुक थे। हालांकि आम लोगों की जितनी क्षमता थी उन्होंने उससे अधिक दान किया बावजूद इसके यह दान पर्याप्त नहीं था। अब बारी आई राजे-रजवाड़ों की और लाल बहादुर शास्त्री ने इनसे भी भारतीय रक्षा कोष में दान देने की अपील की।

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यह अपील मीर उस्मान अली खान ने भी सुनी और उन्होंने तत्काल भारतीय प्रधानमंत्री को हैदराबाद आने का निमंत्रण दिया। बिना देरी किये लाल बहादुर शास्त्री हैदराबाद गए और तब मीर उस्मान अली खान ने भारत की रक्षा हेतु 5 टन सोना देने का ऐलान किया। धीरे-धीरे यह पूरी खबर देश भर में फैल गई और विदेशी मीडिया ने भी इसे बड़े स्तर पर कवर किया।

एक खास बात यह भी है कि जिन बक्सों में भरकर भारत सरकार को सोना दिया गया था बाद में भारत सरकार ने मीर उस्मान अली के आग्रह पर वह बक्से हैदराबाद रियासत को लौटा दिए थे। जाहिर तौर पर इस तरह के दरिया दिल राजे रजवाड़ों के कारण ही भारत की सत्ता और उसकी ताकत हमेशा ही अक्षुण रही है।

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