जिस प्रकार मनुष्यों का अपना जीवनकाल होता है, ठीक उसी प्रकार शहरों और राज्यों का भी अपना कालखंड होता है। उक्त कालखंड में शहर कई रूप धारण करते हैं, कई शासकों को देखते हैं तो तमाम ऐतिहासिक दस्तावेजों के गवाह भी होते हैं। इसी कड़ी में आज हम बात करेंगे पुदुचेरी की, जो कभी पांडिचेरी कहलाता था।

जी हां! यही पांडिचेरी जो फ्रांसीसीयों के अधीन एक लंबे समय तक रहा, तब भी जब समूचे भारत पर अंग्रेज शासन करते थे। कहते हैं फ्रांस द्वारा एक लंबे समय तक शासन किए जाने के फलस्वरूप फ्रेंच कल्चर आज भी इस शहर में महसूस किया जाता है। आइए जानते हैं इस स्थान के बनने बिगड़ने की कहानी को-

इसकी कहानी शुरू होती है 15वीं शताब्दी के आखिर से, जब पुर्तगालियों ने भारत पर व्यापार करने की दृष्टि से अपना प्रभाव बढ़ाना शुरू किया था। बताते हैं कि 1602 ई. तक डचों ने तमाम बिजनेस सेंटर्स के माध्यम से भारत के व्यापार को विभिन्न हिस्सों में फैलाने में सफलता प्राप्त की थी। इसी कड़ी में फ्रांस के सम्राट लुई 14वां भारत के इस हिस्से पर अपना प्रभाव जमाने को बेताब था और इसी क्रम में फ्रांसीसी व्यापारिक कंपनी कंपनी ‘कंपनी द इंड ओरिएंटल’ (कंपनी देस इंडस ओरिएंटल) बनाकर भारत में एंटर कर गयी।

Pic: pondicherry

यह एक सरकारी कंपनी थी और सरकार ही इस कंपनी का खर्च वहन कर रही थी। कंपनी के मुखिया की हैसियत से फ्रेंक कैरो ने भारत के विभिन्न हिस्सों का भ्रमण किया और सूरत से उसने अपना व्यापार शुरू किया। फ्रैंक कैरो ने तब तत्कालीन गोलकुंडा रियासत के सुल्तान से मिलकर दूसरा व्यापारिक संस्थान भी स्थापित कर लिया। इसी क्रम में आगे बढ़ते हुए 1637 ईस्वी में फ्रेंडोइस मार्टिन ने पांडिचेरी की ओर बढ़ना शुरू किया और तत्पश्चात पोंडिचेरी में व्यापारिक मुख्यालय बनने से फ्रांसीसीयों का व्यापार दिन दूना रात चौगुना के हिसाब से आगे बढ़ने लगा।

बताते चलें कि फ्रांसीसीयों के पांडिचेरी आने से पहले यह मात्र एक छोटा सा गांव था, जिसमें मछुआरे मछली के माध्यम से अपना गुजारा करते थे, पर बाद में यह बड़ा व्यापारिक केंद्र बन गया। यहां तक कि तमाम फ्रांसीसी शासित उपनिवेशों के लिए यह स्थान एक तरह से राजधानी के रूप में कार्य करने लगा था। तमाम अधिकारी यहीं पर रहते थे और बाद में जनरल डूमा को इस स्थान का गवर्नर नियुक्त किया गया।

उन्होंने इस शहर में कई बड़े बदलाव किए इसमें मकानों के डिजाइन, गार्डन, सराय, रास्ते इत्यादि फ्रांसीसी आर्किटेक्चर के हिसाब से बनाए गए। कई पीस हाउसेज का निर्माण किया गया जहां तमाम फ्रांसीसी ऑफिसर अपना समय व्यतीत करते थे। इसी क्रम में लाइब्रेरी और म्यूजियम्स का भी निर्माण हुआ। यह गौर करने वाली बात है कि हिंदू मंदिरों को कोई नुकसान पहुंचाए बिना चर्च का निर्माण भी जारी रहा। खाने में भी तमाम फ्रांसीसी व्यंजनों को वरीयता मिलने लगी और इस तरीके से यह शहर आगे बढ़ा।

जैसा कि हम सबको पता है कि यूरोप के तमाम देश उपनिवेशों के मामले में आपसी प्रतिद्वंद्विता के शिकार थे और इसी क्रम में डचों ने बल प्रयोग करके पांडिचेरी पर एक तरह से कब्जा कर लिया और तब फ्रेंच लोग पांडिचेरी से काफी समय तक बाहर ही रहे। बाद में फ्रेंच के व्यापारियों ने डच लोगों से संधि कर ली और दोनों एक दूसरे के व्यापार को सहयोग देने लगे।

कहते हैं कि 17वीं शताब्दी तक पांडिचेरी एक विशाल शहर के आकार में परिवर्तित हो चुका था। बाद में इस स्थान पर अंग्रेजों की भी नजर पड़ी। जैसा कि पता है कि अंग्रेज और फ्रेंच की आपस में बड़ी दुश्मनी थी और इसका असर पांडिचेरी पर भी पड़ा। इसी क्रम में आपस में कई बार लड़ाई हुई और 1761 में ब्रिटिश सेना ने पांडिचेरी पर कब्जा कर लिया था। बाद में फ्रांसीसीयों ने इसे पुनः हासिल किया और तब ब्रिटेन के लोगों ने इस स्थान पर ध्यान देना छोड़ दिया।

Pic: fabhotels

1947 में जब हमारा देश आजाद हुआ और तमाम रियासतें देश में विलय होने लगीं, तब पांडिचेरी का मुद्दा भी गंभीर हो गया। बताते हैं कि तमिलनाडु, केरल और आंध्र प्रदेश तीनों राज्य इस स्थान पर अपना दावा करते थे, इसीलिए 1962 में पांडिचेरी केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया। 2006 में इस स्थान का नाम बदलकर पुदुचेरी रखा गया।

बेशक यहां से फ्रांसीसी चले गए लेकिन उनकी छाप आज ही इस स्थान पर नजर आती है। इस बड़े और मनमोहक शहर की कहानी आप को कैसी लगी, कमेंट बॉक्स में अवश्य बताएं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here