आज़ादी के पहले भारतीय व्यवस्था पहले जमींदारों और भूमिहीनों में बंटी हुई थी। यहां सबको बराबर अधिकार नहीं थे। अंग्रेजी हुकूमत से जब हमारा देश आजाद हुआ, उस समय लाखों लोग हताश और निराश हो चुके थे, क्योंकि आज़ादी की ख़ुशी होने के बावजूद लोगों के पास रोजगार और रोजी-रोटी की बड़ी समस्या सामने खड़ी थी।

चूंकि, पहले के समय कृषि ही एकमात्र बड़ा रोजगार था, इसलिए भूमिहीनों के पास जमीन ना होना, उन्हें भुखमरी की कगार पर ले जाने लगा।

आप यह जानकर शायद ही विश्वास करें कि इन भूमिहीन लोगों के लिए पूरे देश भर से लोगों ने अपनी जमीनें दान की थीं और इस समूचे आंदोलन के नायक थे ‘आचार्य विनोबा भावे’! इन्होंने ही भू-दान आंदोलन चलाया, जो इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है।

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जमीन बंटवारे के लिए प्रयास तो सरकारी भी किए जा रहे थे, लेकिन दक्षिण भारत के तेलंगाना समेत कई हिस्सों में बंदूक के सहारे हिंसा का खेल भी चल रहा था। इसमें कई लोग मर रहे थे। ऐसी स्थिति में आचार्य विनोबा भावे ने 15 अप्रैल 1951 को हिंसा ग्रस्त इलाकों में पदयात्रा शुरू की। हिंसा करने वाले चरमपंथियों से वह मिले, उन्हें समझाया और पीड़ित लोगों से सहानुभूति व्यक्त की। विनोबा भावे ने हरिजन बस्ती की यात्रा की।
उस क्षेत्र के के रामचंद्र रेड्डी नामक व्यक्ति ने विनोबा भावे के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर 100 एकड़ जमीन दान में देने की घोषणा कर दी। यह भूदान आंदोलन की शुरुआत भर थी।

रामचंद्र रेड्डी द्वारा जमीन दान दिया जाना था कि आचार्य विनोबा भावे ने भूदान के लिए समूचे देश का दौरा करने का निश्चय किया। इसके लिए उन्होंने प्रत्येक भूस्वामी से जमीन का छठा हिस्सा दान में मांगा। वह कहते थे “सबै भूमि गोपाल की, नहीं किसी की मालिकी’। उनका यह भी कहना था कि वह विनोबा भावे को अपना एक बेटा समझकर जमीन का छठा हिस्सा दान दें।

भूदान आंदोलन का 70 दिन ही बीता था, जब तकरीबन 12000 एकड़ जमीन विनोबा भावे को दान में मिल चुकी थी। इसके अतिरिक्त वह लगातार चलते गए और अकेले बिहार से उन्होंने तकरीबन साढे 6 लाख एकड़ जमीन दान में ली और लाखों लोगों को, भूमिहीनों को वहां बसा दिया।

कहते हैं कि समूचे भारत में तकरीबन 4200000 (बयालीस लाख) एकड़ जमीन दान में लेने के बाद विनोबा भावे ने जमीन का हिस्सा तुरंत ही हरिजनों और आदिवासियों में बांट दिया।

कहते हैं आचार्य विनोबा भावे से लोग इतने प्रभावित थे कि उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले के मंगरेठ गांव के लोगों ने अपने गांव की समूची जमीन ही दान कर दी थी। इसे ग्रामदान के रूप में जाना गया और जयप्रकाश नारायण तक आचार्य विनोबा भावे से प्रभावित हुए बिना न रह सके।

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कहते हैं महापुरुषों का परिचय उनका किया गया काम होता है और आचार्य विनोबा भावे ने स्वतंत्रा सेनानी रहते हुए, सामाजिक कार्यकर्ता रहते हुए, जिस प्रकार यह कार्य किया वहीं उनका परिचय बन गया। वैसे उनका मूल नाम विनायक नरहरि भावे था और विनायक यानी गणेश की ही भांति आचार्य ने समूचे भारत को अपनी कृपा दृष्टि से सराबोर कर दिया।

इस महान जमीनी सामाजिक सुधारक के बारे में आपके क्या विचार हैं, कमेंट बॉक्स में दर्ज करें।

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