यह कहानी बहुत पुरानी नहीं है!

1965 की लड़ाई में भारत-पाकिस्तान की जंग से भला कौन वाकिफ नहीं है। कहते हैं कि 1965 में भारत ने पाकिस्तान की गर्दन पूरी तरह से दबोच ली थी, लेकिन कुछ गलतियां हुईं जिनकी वजह से लाहौर को कब्जे में लेने के बावजूद भी भारतीय सेना पीछे हट गई। आइए जानते हैं इसकी कहानी-

1965 में अपने ओवर कांफिडेंस के कारण पाकिस्तान ने भारत पर हमला तो कर दिया, लेकिन बाद में उसे एहसास हुआ कि अगर भारतीय सेना इसी जोरदार तरीके से लड़ती रही तो पाकिस्तान विश्व के नक्शे से ही गायब हो जाएगा। बस उसने अमेरिका और ब्रिटेन के सामने गिड़गिड़ाना शुरू कर दिया और इन दोनों देशों ने पाकिस्तान के पक्ष में भारत पर सीजफायर का दबाव बनाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया।

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कहते हैं तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को ब्रिटेन के प्रधानमंत्री हेरोल्ड विल्सन ने फैक्स से मैसेज भेजा था, इस फैक्स में भारत पर हमले की जवाबदेही डालने की कोशिश की गई थी। यहां तक कि चीन ने भी भारत पर दबाव डालने की कोशिश शुरू की। पर यहां भारत का सदाबहार दोस्त सोवियत संघ उसके साथ सीना ठोक कर खड़ा था।

उसका साफ स्टैंड था कि कश्मीर भारत का हिस्सा है और पाकिस्तान ने भारत में घुसकर लड़ाई की शुरुआत पहले की है। हालाँकि, सोवियत संघ भी संघर्ष विराम की सलाह भारत को दे रहा था और तमाम देशों के कहने के कारण भारत आख़िरकार संघर्ष विराम पर तैयार हुआ।

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1975 में एक किताब आई थी जिसका नाम था वॉर, द इनसाइड स्टोरी। इस किताब में तत्कालीन आर्मी चीफ जयंतो नाथ चौधरी और लाल बहादुर शास्त्री के बीच संवाद का जिक्र है। इसमें कहा गया है कि सेना प्रमुख ने शास्त्री जी को कहा कि अगर कुछ दिन और जंग चली तो हमारे पास गोला-बारूद खत्म हो जाएगा।

हालांकि बाद में पता चला कि 14 से 20 फ़ीसदी रिजर्व गोला बारूद भारत के पास था और उस गोला बारूद से पूरा पाकिस्तान घुटनों पर आ सकता था।

संघर्ष विराम के बाद दोनों देशों को सोवियत संघ द्वारा उज्बेकिस्तान के ताशकंद में आने का निमंत्रण दिया गया। उस समय लाल बहादुर शास्त्री ने अयूब खान के सामने ‘नो वार क्लाज’ यानी भविष्य में पाकिस्तान कभी भारत पर आक्रमण नहीं करेगा, इसकी शर्त रखी। लेकिन भुट्टो और अयूब की आपसी बातचीत में यह शर्त नहीं मानी गई।

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10 जनवरी 1966 को भारत समझौते की टेबल पर कमजोर साबित हो चुका था और तमाम पाकिस्तानी इलाके जिसे भारत ने जीता था वह पाकिस्तान को वापस किया जा चुका था। जंग के पहले की स्थिति बहाल कर दी गई थी।

कहते हैं इस समझौते के मात्र 4 घंटे बाद ही शास्त्री जी का देहांत हो गया। आश्चर्यजनक बात यह थी कि शास्त्री जी के शव का पोस्टमार्टम नहीं हुआ और उनकी मौत में साजिश की बात आज तक कही जाती है।

ज़ाहिर था कि अगर गोले-बारूद का संवाद ठीक से होता और बातचीत की टेबल पर भारत दबाव में नहीं आता तो आज पाकिस्तान की कहानी कुछ और ही होती!

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