इस्लाम को तमाम धर्मों में सामान्य तौर पर एक कट्टर धर्म माना जाता है, लेकिन बात जब सूफी पंथ की होती है तो तमाम रिवाज इस्लाम से मिलने के बावजूद भी इसमें नरमीयत नजर आती है।

इसमें हिंदुओं से मिलते जुलते भी कई रिवाज हैं। कहते हैं सफेद लंबे लिबास पहने लोग दुआएं करने वाले कुरान की आयतों के साथ मीरा के भजन और कबीर के दोहे भी पढ़ते हैं।

सूफी पंथ को गंगा जमुनी तहजीब के काफी नजदीक कहा जा सकता है। सूफी शब्द की बात करें तो यह सूफ शब्द से बना है। इसका अभिप्राय है ऐसा लबादा, जो किसी भी रंग का नहीं होता है।

यह मुख्यतः सन्यासियों के लिए इस्तेमाल में लाया जाता है। कई लोग यह भी मानते हैं कि सूफी सोफिया का बिगड़ा हुआ रूप है जो ग्रीक भाषा का अकलमंदी से संबंधित शब्द है।

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बहरहाल भारत में अरब देश के रास्ते सूफी आए थे और अबुल हसन हूज को सूफी पंत का पहला प्रचारक मानते हैं। कहते हैं कि 12वीं शताब्दी के आसपास मोइनुद्दीन चिश्ती ने नार्थ इंडिया में सूफी पंथ का जबरदस्त प्रचार किया। वहीं 13वीं शताब्दी में बाबा फखरुद्दीन ने इसकी जिम्मेदारी संभाली तो 14वीं शताब्दी में इब्न-ए-ख़लदुन ने सूफीवाद को परिभाषित किया और कहा कि शोहरत, दौलत इत्यादि से दूर रहकर रब की इबादत करना ही सूफी पंथ का मूल है।

अकबर के दरबार में भी सूफी पंथ का जिक्र मिलता है। कहते हैं कि भारत में ही सूफी पंथ को काफी विस्तार मिला था क्योंकि यहां का हिंदू समुदाय अपेक्षाकृत उदार था। बाद में अमीर खुसरो इत्यादि लोगों ने सूफी से संबंधित कविताएं रचीं, तो मलिक मोहम्मद जायसी ने भी अपनी रचनाओं से प्रेम का प्रसार किया।

सूफिज्म के बारे में कुरान अथवा किसी हिंदू ग्रंथ में कोई विशेष जानकारी नहीं मिलती है, लेकिन कुरान से संबंधित एक प्रसंग अवश्य मिलता है। हालांकि इसमें भगवान को पाने के रास्ते केवल इस्लाम से ही नहीं बल्कि जैन और ईसाइयत से भी मेल खाते रहे हैं।

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सहीह मुस्लिम, बुक. नं.1 में लिखा गया है कि हजरत मोहम्मद के एक मित्र जिन्हें इब्न-अल-ख़त्ताब के नाम से जाना जाता है। वह बैठे थे तभी एक सफेद रंग का लिबास पहना हुए व्यक्ति आया। उसने पैगंबर से कहा कि उसे इस्लाम के बारे में बताया जाए।

फिर उस शख्स ने एहसास और इमान के बारे में पूछा तो पैगंबर ने उसे इस बारे में भी बताया। बाद में वह व्यक्ति संतुष्ट होकर चला गया। इसके बाद पैगंबर ने इब्न-अल-ख़त्ताब से पूछा था क्या तुम इस शख्स को जानते हो? उन्होंने कहा कि वह जानते नहीं हैं, लेकिन निश्चित रूप से वह अल्लाह का बंदा है।

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फिर पैगंबर ने कहा कि वह जिब्रील थे जो मेरे बहाने तुम्हारे पास आए थे ताकि तुम्हें इस्लाम के बारे में जानने का मौका मिले। इसी एक वाकये को लेकर वेशभूषा से सूफी का संबंध इस्लाम से जोड़ा जाता है।

बहरहाल इस बात में कोई शक नहीं है कि दुनिया में सूफी पंथ प्रेम का और सद्भाव का प्रचार-प्रसार करता रहा है, बेशक कई लोग इसकी आलोचना करते हुए कहते रहे हैं कि यह इस्लाम का प्रवेश-द्वार है।

आपको सूफी-मत के बारे में यह जानकारी कैसी लगी, कमेन्ट-बॉक्स में अपने विचार बताएं।

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