अंग्रेजों ने भारत पर तकरीबन 200 सालों तक शासन किया। 1857 के विद्रोह के पहले उनका ही शासन था, तो उसके बाद 1947 तक उन्होंने भारत पर कठोरता से शासन किया और इसके लिए उन्होंने मानवता को कुचलने से भी परहेज नहीं किया।

मानवता को कुचलने के निर्णय को लेकर ब्रिटेन के शासक और वहां के बुद्धिजीवी आज भी अफसोस करते हैं और भारत आने पर जालियांवाला बाग में जाकर अपना शीश नवाते हैं। इतना ही नहीं अपने पूर्वजों के कृत्य के लिए वह माफी भी मांगते हैं, पर जलियांवाला की असल कहानी क्या है आइए जानते हैं।

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दस्तावेजों की मानें तो 400 से अधिक व्यक्ति घेर कर यहां मार डाले गए थे और 2000 से अधिक लोग बुरी तरीके से घायल हुए थे। हालांकि अनौपचारिक आंकड़ा इससे कहीं ज्यादा का था। इस नरसंहार के बाद समूचे भारत के लोग उबल पड़े थे और ब्रिटिश सेना को उन्हें संभालना मुश्किल पड़ गया था। कहा जाता है कि इस नरसंहार के बाद भारतीय लोगों में क्रांति की ज्वाला फूट पड़ी और अंततः अंग्रेजों को आजादी देने के लिए मजबूर होना पड़ा था।

13 अप्रैल 1919 की बात है, जब पंजाब के अमृतसर में यह घटना घटी थी। इस घटना के पीछे का बैकग्राउंड पहले ही तैयार हो गया था क्योंकि प्रथम विश्वयुद्ध जो 1914 से 1918 के बीच लड़ा गया उसमें अंग्रेजों ने यह वादा किया था कि वह भारत को आजाद कर देंगे। यही सोचकर कई भारतीयों ने प्रथम विश्व युद्ध में अंग्रेजों का साथ दिया था। भारतीयों को आजादी की कितनी उम्मीद थी, आप यह इसी बात से समझ सकते हैं कि प्रथम विश्व युद्ध में भारत के तकरीबन 45000 सैनिक ब्रिटिश सेना की ओर से लड़ते हुए शहीद हो गए थे।

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जैसे ही प्रथम विश्व युद्ध समाप्त हुआ, उसके तत्काल बाद भारत में आजादी की मांग उठने लगी और ब्रिटिशर्स द्वारा इसके लिए एक कमेटी भी बनाई गई। लेकिन वह कमेटी इस बात की जांच करने लगी कि आजादी के लिए उठ रहे आंदोलनों में कहीं कोई बाहरी ताकत तो भारतीयों की मदद नहीं कर रही है? इसके दरमियां ‘रोलेट एक्ट’ लागू किया गया और इस एक्ट के माध्यम से भारत में चल रहे मूवमेंट पर रोक लगाने की कोशिश की गई।

प्रेस को सेंसर किया गया और किसी भी नेता को बिना मुकदमे के जेल में डालने का अधिकार ब्रिटिश शासन ने अपने हाथ में ले लिया।

13 अप्रैल को बैसाखी का पर्व पंजाब में मनाया जा रहा था और जालियांवाला बाग में भी यह मेला आयोजित किया गया था। यहीं पर ‘रौलट एक्ट’ के विरोध के लिए एक सभा बिठाई गई। इस सभा की खबर ‘जनरल डायर’ को लग गई जो ब्रिटिश शासन का एक खूंखार अफसर था। उसने बिना किसी चेतावनी के अपने सिपाहियों के साथ पहुंचकर सभा पर गोलियां बरसानी शुरू कर दी। जालियांवाला बाग अगर आप कभी गए हैं तो आप वहां की संरचना समझ पाएंगे कि तब के समय में चारों तरफ से उसके दीवारें थी और एक बहुत पतली संकरी गली थी, जिससे आया और जाया जा सकता था।

उसी रस्ते पर खड़ा हो कर जनरल डायर ने गोलियां चलवायीं। सभा कर रहे लोगों का कहीं भागने का रास्ता नहीं था और मानवता का इस तरह से नरसंहार विश्व इतिहास में शायद ही कभी हुआ था! कहते हैं कि जालियांवाला बाग में एक कुआँ था, जिसमें गोलियों से बचने के लिए लोग कूदते गए और लाशों से वह कुआं पूरा भर गया था। कई रिपोर्ट के अनुसार इस हत्याकांड में 41 नाबालिग लड़कों की मौत हो गई थी तो एक डेढ़ महीने का बच्चा भी मारा गया था।

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इस हत्याकांड पर तत्कालीन ‘ब्रिटिश महारानी एलिजाबेथ’ और तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री ‘डेविड कैमरन’ ने ब्रिटिश इतिहास की सबसे शर्मनाक घटना बताकर मृतकों को श्रद्धांजलि दी थी और माफी मांगी थी।

हालांकि ब्रिटिश प्रशासन का यह सोचना गलत निकला कि इसके बाद आंदोलनों की रफ़्तार रूक जाएगी, बल्कि पूरे देश में लोग आंदोलित हो गए और इसी हत्याकांड के बाद शहीद भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और महात्मा गांधी के नेतृत्व में अलग-अलग धाराओं का आंदोलन चला, जो भारत को स्वतंत्र करा कर ही थमा।

आप इस मानवता के नरसंहार को कैसे देखते हैं, कमेंट बॉक्स में अपने विचार अवश्य लिखिए।

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