भारत में जयचंद का नाम गद्दारों की सूची में सबसे ऊपर लिया जाता है! कहते हैं कि उसकी गद्दारी के कारण ही भारत में मुस्लिम शासन प्रारंभ हुआ और उसके पश्चात ही भारत गुलामी की ओर अग्रसर हो गया। पर क्या वाकई ऐसा था… और इसके पीछे की कहानी क्या है? आइए जानते हैं-

तत्कालीन समय में भारत बेहद संपन्न राष्ट्र था और 1191 ईस्वी में मोहम्मद गोरी ने इस पर हमला किया था। उस वक्त दिल्ली के शासक पृथ्वीराज चौहान थे और उन्होंने दूसरे राजाओं के साथ मिलकर मोहम्मद गौरी को भारत से भागने पर विवश कर दिया था। कहते हैं इस हार को मोहम्मद गोरी पचा नहीं पाया था और पृथ्वीराज से बदला लेने का मौका वह बड़ी शिद्दत से ढूंढने लगा था।

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इस कड़ी को यहीं छोड़कर इस कहानी के दूसरे भाग यानी “प्रेम कहानी” की ओर बढ़ते हैं। इतिहास की मशहूर प्रेम कहानियों में पृथ्वीराज और संयोगिता की प्रेम कहानी भी गिनी जाती है और यही प्रेम कहानी एक माध्यम बनी जिसके फलस्वरूप आगे आने वाला इतिहास पूरी तरह बदल गया।

कहते हैं संयोगिता के पिता राजा जयचंद पृथ्वीराज से किसी भी रिश्ते के पूरी तरह खिलाफ थे, किंतु जयचंद की मर्जी के खिलाफ जाकर पृथ्वीराज ने संयोगिता को उनके राज्य से अगवा कर लिया। जयचंद ने पृथ्वीराज की इस हरकत को अपना अपमान समझा और उन दोनों का आपसी रिलेशन इससे दिन-ब-दिन बिगड़ता चला गया। कहते हैं जयचंद ने इसके खिलाफ पृथ्वीराज पर आक्रमण भी किया था, लेकिन तब उन्हें जीत नहीं मिली थी।

हालांकि दुश्मनी कम नहीं हुई और दिन पर दिन बड़ी ही होती चली गई। यह भी कहा जाता है कि जयचंद के प्रभाव में तमाम दूसरे राजपूत राजा भी थे जिन्होंने पृथ्वीराज का साथ छोड़ दिया था। इस बदले की राजनीति के कारण पृथ्वीराज मोहम्मद गौरी के खिलाफ अकेले पड़ते चले गए थे। बावजूद इसके वह तमाम राजाओं में सबसे मजबूत और सबसे बहादुर योद्धा के तौर पर गिने जाते थे।

जयचंद ने जब यह भांप लिया कि पृथ्वीराज उनके और दूसरे राजपूत राजाओं के दबाव में नहीं आएंगे और चाह कर भी जयचंद उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकते, तब जयचंद ने मोहम्मद गौरी को सैन्य मदद के साथ भारत पर हमला करने का न्यौता दे डाला।

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ऐसी स्थिति में पृथ्वीराज ने एक बार फिर दूसरे राजपूत राजाओं को संगठित करने का प्रयास किया, लेकिन जयचंद के प्रभाव में कोई भी राजा पृथ्वीराज के साथ खड़ा नहीं हुआ, बल्कि कहा तो यह भी जाता है कि उनमें से कई गौरी के साथ ही जा मिले थे।

हालांकि इन सबके बावजूद पृथ्वीराज के पास 300000 से अधिक की सैन्य ताकत थी जबकि मोहम्मद गौरी के पास मात्र सवा लाख सैनिक ही थे। तराइन की दूसरी लड़ाई हुई और शुरू में पृथ्वीराज बढ़ते चले गए थे, पर मुश्किल तब आई जब मोहम्मद गौरी के घुड़सवार सैनिकों ने अपनी तीरंदाजी से युद्ध का पासा पलट दिया।

उन्होंने सिर्फ और सिर्फ पृथ्वीराज के हाथियों पर वार करना शुरू किया और हाथियों ने खुद पृथ्वीराज की अपनी ही सेना को तहस-नहस कर दिया। अंततः पृथ्वीराज चौहान की युद्ध में बड़ी हार हुई और उसके आगे की कहानी हमें पता है कि पृथ्वीराज चौहान को मोहम्मद गौरी की सभा में मौत का सामना करना पड़ा था।

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हालांकि इस प्रचलित कहानी पर तमाम इतिहासकार एकमत नहीं हैं और साक्ष्यों के स्तर पर बात की जाए तो संयोगिता-हरण और उसके प्रेम के अतरिक्त, जयचंद द्वारा मोहम्मद गौरी को न्योता देने की बात भी ठीक ढंग से ऐतिहासिक दस्तावेजों में दर्ज नहीं है, परंतु इतिहास हमेशा ठीक बात ही नहीं बताता है, जबकि कई बार समाज में प्रचलित बातें सत्य का प्रतिरूप होती हैं। आपको जयचंद की यह कथा कैसी लगी, कमेंट बॉक्स में अपने विचारों से हमें अवश्य ही अवगत कराएं!

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