महान भारत में एक से बढ़कर एक राजा हुए हैं और यह कह पाना बेहद मुश्किल है कि उनमें सबसे प्रतापी और शक्तिशाली राजा कौन था। पर बात जब कुषाण वंश के कनिष्क प्रथम की आती है तब वह न केवल सैन्य क्षेत्र में बल्कि आध्यात्म और राजनीतिक क्षेत्रों में शिखर पर स्थापित दिखते हैं। इस बात में कोई शक नहीं है कि इन्होंने ना केवल भारत पर शासन किया बल्कि पश्चिमी चीन तक इनके शासन के अधीन था। यहाँ तक कि मशहूर सिल्क रूट पर इन्हीं कनिष्क का शासन था। ऐसे महान शासक के कार्यकाल पर आइए एक दृष्टि दौड़ाते हैं-

कुषाण मध्य एशिया की यू-ची जाति की एक ब्रांच थी, जो उस वक्त चीन में ही रहती थी। मौर्य शासन काल के बाद भारत आने वाली कई जातियों में शक, पहलव की तरह कुषाण भी एक विदेशी प्रजाति थी। इसी वंश में कनिष्क ने शासन किया और अपने साम्राज्य का विस्तार किया। 78 ई. के आसपास कनिष्क के शासन की शुरुआत मानी जाती है और उत्तर भारत में इसने उत्तर प्रदेश के बनारस से कौशांबी और श्रावस्ती इत्यादि तक अपना शासन फैलाया था।

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बताते चलें कि कनिष्क के समय व्यापार अपने चरम पर था और सिल्क रूट पर इनका अधिक क्षेत्र होने की वजह से तमाम देश बेहतरीन ढंग से कनेक्टेड थे और इससे भारत को खासा लाभ होता था। चूंकि पूर्व से पश्चिम की ओर होने वाला प्रत्येक व्यापार कनिष्क के राज्य से ही गुजरता था।

कनिष्क के समय संस्कृति का खासा विकास हुआ और उनके संरक्षण में बौद्ध धर्म का बड़ा प्रचार हुआ है। बौद्ध धर्म को वस्तुतः राज्य संरक्षण प्राप्त था। उन्होंने चतुर्थ बौद्ध संगीति आयोजित की थी और इसमें वासुमित्र और अश्वघोष जैसे विद्वान शामिल थे। इसी समय महाविभासा नामक पुस्तक की रचना हुई जिसमें बौद्ध धर्म के तमाम संदेश और टीकाएँ इत्यादि सम्मिलित हैं। इसे बौद्ध संस्कृति का इनसाइक्लोपीडिया भी कहा जाता है।

कनिष्क के और कार्यों की बात की जाए तो इन्होंने पाकिस्तान के पेशावर में एक विशाल स्तूप बनवाया था जिसका जिक्र चीनी यात्री फाह्यान ने किया है। इसी प्रकार कनिष्क के समय तमाम सिक्के जारी किए गए जिसमें विभिन्न संस्कृतियों का सम्मिश्रण दिखता है। इनमें हिंदू देवी देवता, ईरानी यूनानी देवी देवता तक खुदे हुए हैं। उन्होंने पाकिस्तान के मुल्तान में सूर्य मंदिर भी बनवाया जो बेहद प्रसिद्ध है। यह भी कहा जाता है कि शिव के दूसरे पुत्र कार्तिकेय भगवान की पूजा की शुरुआत कनिष्क के समय में ही हुई और राज सिक्कों पर इसका प्रभाव स्पष्ट देखा जाता है।

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कनिष्क के जीवन की बात की जाए तो वह चीन के सम्राट की पुत्री से प्रेम करते थे और उससे विवाह का प्रस्ताव भी उन्होंने चीनी सम्राट के सामने रखा। लेकिन, उस वक्त का चीनी राजा इसे खारिज कर चुका था और इसीलिए उसे कनिष्क से युद्ध भी लड़ना पड़ा। हालाँकि कनिष्क यह युद्ध हार गए लेकिन दूसरी बार लड़ाई हुई तो कनिष्क ने जीत हासिल की, लेकिन लंबे समय तक ही यह जीत कायम नहीं रही। 101-102 ईस्वी में कनिष्क इस दुनिया से चल बसे और 23 साल के अपने शासन में उन्होंने हिंदुस्तान के बहुत बड़े भूभाग पर शासन करके अपना लोहा मनवा दिया।

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