भारत के प्रसिद्ध वार मेमोरी में इंडिया गेट का अपना महत्वपूर्ण स्थान है। अधिकांश लोगों को इस बात की जानकारी नहीं होगी कि यह अंग्रेजों के समय का ही बना हुआ है।

इसको बनने में तकरीबन 10 साल के आसपास समय लगा था। अगर संक्षिप्त में बात की जाए तो यह उन शहीद सैनिकों की याद में बना है जो प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटिश शासन की तरफ से लड़ते हुए शहीद हुए थे।

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42 मीटर की ऊंचाई और 9 पॉइंट 1 मीटर की चौड़ाई वाले इस कांप्लेक्स का डायमीटर 306000 स्क्वायर मीटर के एरिया में फैला हुआ है। इसे बनाने में मुख्यतः ब्लू और रेड सैंड स्टोन और ग्रेनाइट का इस्तेमाल किया गया है, जबकि इसका आर्किटेक्चरल ट्राइअम्फल आर्च पर है। इसके डिज़ाइनर सर एडविन लुटियंस माने जाते हैं।

दिल्ली के दिल में स्थित इंडिया गेट की अपनी खास अहमियत है। राजपथ पर स्थित इस जगह पर बने वार मेमोरियल जिन शहीदों के नाम पर बना हुआ है वो 1914 से 1921 के बीच में शहीद हुए थे।

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि इसमें तकरीबन 82000 सैनिकों की यादें जुड़ी हुई हैं। इस स्थान का पहला पत्थर 10 फरवरी 1921 को एक फौजी जलसे में रखा गया था। फ्रेडरिक नामक कमांडर इन चीफ और विस्काउंट चेम्सफोर्ड जो उस समय इंडिया के वायसराय थे, वह भी इस जलसे में उपस्थित थे।

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तत्कालीन समय में एडमिन लुटियंस वार मेमोरियल डिजाइन करने के प्रमुख आर्किटेक्ट माने जाते थे। आप यह जानकर हैरान ना हों कि उन्होंने तकरीबन 66 वार मेमोरियल अकेले यूरोप में ही डिजाइन किए थे।

यहां तक कि लंदन का मशहूर सेनोटैफ 1919 में उन्होंने डिजाइन किया था। इस स्थान पर इस्तेमाल होने वाले रेड और येलो सैंड स्टोन भरतपुर राजस्थान से मंगाये गए थे। इसकी सुंदरता देखते ही बनती है तो इसकी मजबूती का कोई तोड़ नहीं है।

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इंडिया गेट की बीचों-बीच स्थित अमर जवान ज्योति का भी अपना खास महत्व है। ब्लैक मार्बल के ऊपर रखा हुआ राइफल और उसके ऊपर आर्मी की टोपी सारी कहानी खुद-ब-खुद कहती है। इसमें स्थाई रूप से फ्लेम जलती है जो सीएनजी के द्वारा जलाई जाती है।

अमर जवान गोल्डन कलर में लिखा हुआ है जो शहीदों के अमर होने की पुष्टि करता है। इस अमर जवान स्तंभ को बांग्लादेश की आजादी की लड़ाई के बाद 1971 में बनवाया गया था, जो शहीदों को श्रद्धांजलि के रूप में याद किया जाता है। इस मेमोरियल का उद्घाटन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा 26 जनवरी 1972 को किया गया था।

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