भारतवर्ष में एक से बढ़कर एक ऐतिहासिक निर्माण हुए हैं और इन्हीं ऐतिहासिक निर्माणों में कुतुबमीनार का अपना एक स्थान है। यह न केवल भव्य है बल्कि बेहद यूनिक भी है।

यूनेस्को द्वारा वर्ल्ड हेरिटेज की लिस्ट में कुतुबमीनार को शामिल किया गया है और इसे देखने के लिए देश-विदेश से प्रत्येक वर्ष लाखों सैलानी पहुंचते हैं। इसकी कहानी क्या है और इसकी किन खासियतों की वजह से अपने निर्माण के 800 साल बाद भी रिलेवेंट बना हुआ है आईये जानते हैं।

यह दिल्ली के महरौली क्षेत्र में छतरपुर मंदिर के पास स्थित विश्व की दूसरी सबसे ऊंची मीनार मानी जाती है। 12वीं और 13वीं शताब्दी के बीच में कई शासकों द्वारा इस मीनार का निर्माण कराया गया।

इसमें 1193 ईस्वी में सबसे पहले कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा कुतुबमीनार बनवाना शुरू किया गया था और अधिकांश लोग इन्हें ही कुतुबमीनार का निर्माणकर्ता मान लेते हैं।

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किंतु सच तो यह है कि कुतुबमीनार का बेसमेंट और पहली मंजिल का निर्माण ही कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा करवाया गया था। इसके बाद दिल्ली के सुल्तान कुतुबुद्दीन ऐबक के पोते और तत्कालीन समय में दिल्ली की गद्दी संभालने वाले ‘इल्तुमिश’ ने इस मीनार की तीन और मंजिल बनवाई। किंतु उसके द्वारा भी यह पूरा नहीं हुआ इसके बाद 1368 ईसवी में मीनार की पांचवी और अंतिम मंजिल ‘फिरोजशाह तुगलक’ के द्वारा पूरी करवाई गई।

अगर आपको लग रहा है कि निर्माण और उसकी मरम्मत का कार्य कहीं तक खत्म हो गया है तो आप गलत हैं। 1508 ईस्वी में एक बड़ा भूकंप आया था और यह इमारत तहस -नहस हो गई थी। फिर लोदी वंश के द्वितीय सुल्तान ‘सिकंदर लोधी’ द्वारा इसकी मरम्मत कराई गई। 379 सीढ़ियों वाली इस मीनार में लाल बलुआ पत्थर और संगमरमर का इस्तेमाल हुआ है।

इसकी कुल ऊंचाई 73 मीटर है तो इसके नाम को लेकर भी लोग कंफ्यूज रहते हैं। कई लोग कहते हैं कि इसका नाम कुतुबुद्दीन ऐबक के नाम पर रखा गया, जिसका मतलब होता है ‘न्याय का ध्रुव’! वही कुछ दूसरे हिस्टोरियन मानते हैं कि एक सूफी संत ख्वाजा ‘कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी’ के नाम पर इस इमारत का नाम ‘कुतुबमीनार’ पड़ा है।

वैसे इतिहास में इसे ‘विजय मीनार’ के नाम से भी संबोधित किया गया है।

हालांकि कई लोग इस मीनार को बनाने के पीछे 27 हिंदू मंदिरों को तोड़े जाने की बात भी कहते हैं और इन्हीं मंदिरों से निकले पत्थरों से इस इमारत का निर्माण किया गया था, ऐसे उद्धरण सामने आते हैं। वैसे भी इस इमारत की संरचना एवं बनावट राजपूत टावरों से प्रेरित मानी जाती है।

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बहरहाल जो भी हो, इस मुगलकालीन वास्तुकला के उदाहरण के रूप में क़ुतुब मीनार अपने आप में लाजवाब है। बेहद छोटी-छोटी बारीकियों पर ध्यान देकर तत्कालीन समय के वास्तुकार और शिल्पकार इस इमारत की खूबसूरती को निखारने में किसी प्रकार की कसर नहीं छोड़ी है। प्रत्येक मंजिल की बनावट पर खास ध्यान इस इमारत के निर्माण में दिया गया है।

इस इमारत की बालकनी से दिल्ली शहर का नजारा देखना अपने आप में अद्भुत अनुभव देता है। इस इमारत की बारीकी का ध्यान आप इसी बात से दे सकते हैं कि इस इमारत के पत्थरों पर कुरान की आयतें खुदी हुई हैं। इतना ही नहीं अरबी लिपि में कई शिलालेख भी इसमें इस्तेमाल में लाए गए हैं।

इस इमारत के परिसर में एक ‘लौह स्तंभ’ है, जिसका निर्माण चंद्रगुप्त द्वितीय द्वारा तकरीबन 2000 साल से अधिक पहले कराया गया था। हालांकि इस आयरन पिलर में किसी प्रकार की जंग नहीं लगी हुई है जो अपने आप में एक भारी आश्चर्य माना जाता है।

इस इमारत के परिसर में ‘इल्तुतमिश’ का मकबरा अलाई दरवाजा, कुव्वत-उल-इस्लाम इत्यादि की खूबसूरती को बढ़ाते हैं और सैलानियों को अपनी तरफ मजबूती से खींचते हैं।

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अगर आप यहाँ नहीं गए हैं तो आपको बता दें कि सुबह 6:00 बजे से शाम 6:00 बजे तक यह मीनार खुली होती है। किसी भी मौसम में इसे देखने जाया जा सकता है, क्योंकि यह दिल्ली में स्थित है। ट्रांसपोर्ट की यहां कोई भी समस्या नहीं है। बाई रोड, बाई ट्रेन या बाई एयर भारत या विश्व के किसी भी कोने से यहां पहुंचा जा सकता है।

आप क्या कहेंगे इस ऐतिहासिक स्थल के बारे में… कमेंट बॉक्स में अपने विचार दर्ज करें।

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