भारतीय इतिहास में एक से बढ़कर एक सूरमा हुए हैं, जिन्होंने अपने बाहुबल और अपने विचार से तमाम राष्ट्रों-राज्यों की सीमाएं बदल डाली हैं। इनमें से कई ने जनता के दिल में अपना विशिष्ट स्थान प्राप्त किया है, तो कईयों को जनता की नफरत का शिकार भी होना पड़ा है। जैसा कि हम सब जानते हैं कि राजतंत्र में लड़ाइयां होती ही रहती थीं और यही लड़ाईयाँ निर्णय देती थीं कि किस राजा का शासन किस क्षेत्र में चलेगा! ऐसी ही बड़ी लड़ाईयों में नागौर की लड़ाई भी मानी जाती है, जिसमें राणा कुंभा की वीरता के दर्शन होते हैं।

इस लड़ाई में कूटनीति, राजनीति के तमाम दांव-पेंच भी रहे हैं तो स्वार्थ के कारण जुबान से मुकरना भी शामिल रहा है। आइए जानते हैं इसकी कहानी को-

इस कहानी को समझने से पहले हमें महमूद खिलजी की उस हार को समझना पड़ेगा, जो राणा कुंभा से उसे मिली थी। यह बात 1440 की है, जब मांडवगढ़ के युद्ध में महमूद खिलजी को बड़ी हार मिली थी, क्योंकि उसने मेवाड़ में घुसपैठ की कोशिश की थी। उस लड़ाई में हार के बाद महमूद ने पुनः 1446 में राणा कुंभा के ऊपर हमला किया, लेकिन यहां भी उसे मुंह की खानी पड़ी। बस उसी समय से उसने राणा के खिलाफ मन में गाँठ बाँध ली।

Pic: history…

उधर एक दूसरे घटनाक्रम में राणा कुंभा ने नागौर की गद्दी पर शम्स खान को बिठाने के लिए उसका साथ देने का निश्चय किया। बताते चलें कि नागौर के शासक सुल्तान फिरोज खान के दो बेटों जिनमें बड़ा शम्स खान था, जबकि छोटा बेटा मुजाहिद खान था। उनमें सत्ता के लिए आपसी लड़ाई हो गई थी और छोटे बेटे ने बड़े भाई शम्स खान की सत्ता हथिया ली थी।
चूंकि नागौर के ऊपर राणा कुंभा की भी नजर थी, इसलिए वह शम्स खान की मदद करने को राजी हुए ताकि कठपुतली शासक बना कर नागौर पर उनका प्रभुत्व बना रहेगा।

इस प्रकार राणा कुंभा ने अपनी बड़ी सेना से नागौर पर हमला किया और मुजाहिद खान की सेना को आसानी से हरा दिया। मुजाहिद खान को नागौर से भागना पड़ा। नागौर में जीत के बाद राणा ने शम्स खान को सत्ता की कुर्सी पर बिठाया और खुद मेवाड़ लौट गए। मेवाड़ लौटने से पहले राणा ने शम्स खान को सैन्य इत्यादि मुद्दों पर क्लियर हिदायत दे दी थी।

हालांकि बाद में शम्स खान ने राणा को धोखा दे दिया और जिस किले को तोड़ने की बात थी, वह उसकी दीवारों को मजबूत बनाने में लग गया। मतलब वह अपनी सेना सुरक्षित करके राणा को अनसुना करने की ख्वाहिश रखने लगा था।

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इस प्रकार से धोखा खाने के पश्चात राणा कुंभा ने दोबारा नागौर पर हमला कर दिया और शम्स खान को नागौर से बाहर निकाल फेंका। शम्स खान भी हारकर गुजरात सल्तनत भाग गया जहां उसका भाई मुजाहिद खान भागा हुआ था।

इस प्रकार से नागौर की बड़ी लड़ाई में छल कपट के बावजूद राणा कुंभा ने अपना वर्चस्व साबित किया और इस लड़ाई में जीत के लिए उन्हें इतिहास के नायकों में शुमार किया जाता है।

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