दुनिया में तमाम महापुरुषों की आलोचना हुई है और महात्मा गांधी भी इसके अपवाद नहीं रहे हैं। वह भारत के राष्ट्रपिता कहे जाते हैं, बावजूद इसके उनके फैसलों की कई एंगल से आलोचना की जाती है। पर बापू के आलोचक जिस सबसे बड़ी बात पर उनकी आलोचना करते हैं, वह है क्रांतिकारी भगत सिंह की फांसी का कथित रूप से विरोध करना।
कहते हैं कि बापू भगत सिंह की फांसी का विरोध करते तो भगत सिंह को फांसी नहीं होती! पर क्या वास्तव में यही सच है? आइए चलते हैं इस यात्रा पर-

23 मार्च 1931 को अंग्रेजों ने मनमानी सुनवाई करके शिवराम, राजगुरु, सुखदेव और भगत सिंह को फांसी पर लटका दिया। इस फांसी के बाद समूचा हिंदुस्तान रोया। यहां तक कि जेल का वार्डन चरत सिंह भी खुद को रोने से बचा नहीं पाया था।

कहते हैं उस दिन बहुत जोर का तूफान आया था!

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सबको ज्ञात ही है कि यह फांसी तय समय से 12 घंटे पहले ही दे दी गई थी, क्योंकि जेल के बाहर लोगों की भीड़ इकट्ठी थी और अंग्रेज इस बात से सशंकित थे कि कहीं भीड़ जेल पर हमला ही ना कर दे!
इस फांसी का विरोध पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्नाह ने भी किया और उन्होंने अपनी स्टेटमेंट में कहा कि भगत सिंह को फांसी देकर न्याय का मजाक बनाया गया है। हालांकि खुद जिन्नाह ने भगत सिंह को बचाने के लिए कुछ खास प्रयास किया हो इसकी ऐतिहासिक जानकारी नहीं मिलती।

जिन्ना न सही पर भारत के तमाम युवाओं को महात्मा गांधी से अवश्य ही यह आशा थी! भगत सिंह की फांसी के बाद महात्मा गांधी का विरोध शुरू हो गया और बड़ी संख्या में युवाओं ने गांधीजी को काले कपड़ों की माला भेंट की थी।
जाहिर तौर पर यह लोगों की बड़ी नाराजगी थी। हालांकि महात्मा गांधी ने इस बारे में अपनी सफाई जरूर पेश की थी।

फांसी के अगले दिन वह कराची में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे थे और उन्होंने कहा कि अंग्रेजी वायसराय को समझाने की उन्होंने भरपूर कोशिश की थी और इसके लिए उन्होंने कई पत्र भी लिखे थे। दूसरे कांग्रेसी नेताओं ने भी अपनी सफाई में कहा कि भगत सिंह की फांसी की सजा उम्र कैद में बदलने पर सहमति बन चुकी थी, लेकिन बाद में अंग्रेजों ने इसे वापस ले लिया।

भगत सिंह की फांसी से युवा, गांधी और कांग्रेस से इतने नाराज थे कि कांग्रेस को देश के युवाओं को समझाने के लिए कई चीजों की दुहाई देनी पड़ी। हालांकि बाद में महात्मा गांधी ने अंग्रेजों को भगत सिंह को फांसी देने के लिए लताड़ा, किंतु युवा इतने भर से संतुष्ट नहीं थे।

कई बुद्धिजीवी लोग यह भी मानते थे कि गांधी ने पूरी तरह से भगत सिंह की फांसी का विरोध नहीं किया। लोगों ने तर्क दिया था कि गांधी-इरविन समझौते में भगत सिंह की फांसी रुकवाने की शर्त जोड़ी जा सकती थी, लेकिन महात्मा गांधी ने इससे इनकार कर दिया था। गौरतलब है कि 5 मार्च 1931 को यानी फांसी से तकरीबन 18 दिन पहले महात्मा गांधी और लॉर्ड इरविन के बीच एक पॉलीटिकल पैक्ट हुआ था जिसे गांधी इरविन पैक्ट कहा जाता है।

खुद भगत सिंह ने इस पैक्ट की आलोचना करते हुए कहा था कि कांग्रेस का आंदोलन आख़िर एक दिन समझौते में बदल जाएगा और यही हुआ!

यह बात तो सबको पता ही है कि महात्मा गांधी और भगत सिंह की लड़ाई के रास्ते अलग थे किंतु इस बात से भला कौन इनकार कर सकता है कि दोनों का उद्देश्य एक ही था। गांधीजी जहां मानते थे कि भारत को अहिंसा से आजादी मिलेगी, वहीं भगत सिंह का विचार इससे अलग था, किंतु देश हित के लिए क्या एक के द्वारा दूसरे का समर्थन नहीं किया जाना चाहिए और क्या इसे पूरे दिल से नहीं किया जाना चाहिए था?

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यह प्रश्न कल भी था, आज भी है और कल भी बना रहेगा! इस संबंध में आपके क्या विचार हैं, कमेंट बॉक्स में दर्ज कराएं।

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