हिंदू धर्म के प्रमुख तीर्थों में इसका नाम शामिल है और भारत के शौर्यपूर्ण इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय भी इसी ‘सोमनाथ मंदिर’ से संबंधित है। गुजरात स्टेट के वेरावल बंदरगाह में प्रभास पाटन के पास यह महत्वपूर्ण मंदिर स्थित है। भौगोलिक दृष्टि से अगर इस स्थान की व्याख्या करें तो अंटार्कटिका तक सोमनाथ समुद्र के बीच एक सीधी रेखा में भूमि का कोई भी हिस्सा मौजूद नहीं है।

भगवान शंकर के 12 महत्वपूर्ण ज्योतिर्लिंगों में पहला स्थान सोमनाथ का ही माना जाता है। सोमनाथ की धार्मिक महत्ता आप इसी बात से समझ सकते हैं कि ‘ऋग्वेद’ में वर्णित इस मंदिर का निर्माण खुद ‘चंद्रदेव सोमराज’ द्वारा किया गया माना जाता है। सोमनाथ मंदिर के प्रसिद्ध होने की दूसरी ऐतिहासिक वजह भी है। माना जाता है कि भारत का सबसे धनी मंदिर होने का गौरव इसी सोमनाथ मंदिर को लम्बे समय तक प्राप्त रहा है।

धन-संपदा, वैभव से आकर्षित होकर मुस्लिम आक्रमणकारियों द्वारा सोमनाथ मंदिर पर कई बार हमला किया गया था। महमूद गजनवी द्वारा इस मंदिर पर कई बार आक्रमण करना और यहां से संपत्ति को लूट कर ले जाना इतिहास में दर्ज है। सन 1026 में महमूद गजनवी द्वारा पहली बार इस मंदिर पर आक्रमण किया गया था और अथाह संपत्ति लूटने के बाद इसे नष्ट कर दिया गया था।

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बाद में गुजरात के राजा ‘भीम’ और मालवा के राजा ‘भोज’ द्वारा इस मंदिर का निर्माण कराया गया। उसके बाद इस मंदिर पर हमले होते रहे और इस मंदिर का पुनर्निर्माण किया जाता रहा।

आजादी के बाद भारत के पहले गृह मंत्री लौह पुरुष ‘सरदार वल्लभ भाई पटेल’ द्वारा इस मंदिर का पुनर्निर्माण 1951 में कराया था। प्राचीन हिंदू वास्तु कला एवं चालुक्य वास्तु शैली में निर्मित इस मंदिर के बारे में यह किवदंती भी प्रचलित है कि यहीं पर भगवान श्री कृष्ण ने अपना शरीर त्याग किया था।

इस मंदिर के इतिहास की विस्तृत रूप में बात करें, इससे पहले भी इस मंदिर का अस्तित्व माना जाता है। हालांकि दूसरी बार इसका निर्माण सातवीं शताब्दी में वल्लभी के कुछ मैत्रिक सम्राटों के हाथों किया गया था। वहीं आठवीं सदी में करीब 725 ई. में सिंध के अरबी गर्वनर ‘अल-जुनायद’ ने इस मंदिर का वैभव नष्ट करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। 1024 ईस्वी में महमूद गजनवी द्वारा इस वैभवशाली मंदिर पर आक्रमण किया गया। उसने करोड़ों की संपत्ति लूटने के साथ शिवलिंग को भी क्षतिग्रस्त किया एवं हजारों बेकसूर लोगों की जान ले ली थी।

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1168 ई. में विजयेश्वरे कुमारपाल और सौराष्ट्र के सम्राट ‘खंगार’ द्वारा इस मंदिर का सुंदरीकरण किया गया था। हालांकि 1297 ईस्वी में अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति ‘नौशाद खान’ ने एक बार फिर इस तीर्थ स्थान को नष्ट कर दिया और जमकर लूटपाट की। बाद में 1395 ईस्वी में गुजरात के सुल्तान मुजफ्फर शाह द्वारा इस मंदिर में लूटपाट की गई और 1413 ई. में उसके बेटे ‘अहमदशाह’ द्वारा इस मंदिर में तोड़फोड़ किया गया।

मुगल बादशाह औरंगजेब द्वारा भी इस मंदिर पर 2 बार आक्रमण किया गया था। पहला 1665 और दूसरा 1706 में। जाहिर तौर पर इन हमलों में कई बेकसूर लोगों की जान जाती रही। बाद में 1783 में इंदौर की महारानी ‘अहिल्याबाई’ द्वारा सोमनाथ महादेव जी का मंदिर निर्माण कराया गया था। समझना मुश्किल नहीं है कि आक्रमण के इस दौर में पूरी हिंदू संस्कृति सोमनाथ मंदिर द्वारा प्रतिनिधित्व की गई।

ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार इस मंदिर के पहले निर्माणकर्ता चंद्रदेव द्वारा किए जाने का जिक्र बेहद दिलचस्प है। कहते हैं कि चंद्रदेव की कई पत्नियों में सबसे खूबसूरत ‘रोहिणी’ थी। चंद्रमा उन्हें सबसे अधिक प्रेम करते थे। उधर सम्राट दक्ष ने अपनी दूसरी पुत्रियों के साथ भेदभाव होते देखकर चंद्रमा को पहले समझाने का प्रयत्न किया गया और उनके न समझने पर क्षय रोग से ग्रसित हो जाने का अभिशाप देना पड़ा। इस अभिशाप से मुक्ति के कारण चंद्रदेव ने भगवान शंकर की कठोर आराधना की और उन्हें श्राप से मुक्ति मिली।

कहते हैं कि भगवान शंकर के आशीर्वाद के स्वरूप ही शुक्ल पक्ष में चंद्रमा अधिक चमकते हैं, जबकि कृष्ण पक्ष में उनकी चमक कुछ कम होती है। राजा दक्ष के अभिशाप से मुक्त होने के बाद शंकर भगवान का शिवलिंग स्थापित कर सोमनाथ मंदिर का निर्माण कराया गया। इस महान मंदिर का वर्णन ऋग्वेद से लेकर श्रीमद् भागवत, महाभारत और स्कंद पुराण तक में वर्णित है।

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यह भी कहा जाता है कि यहीं पर भगवान श्री कृष्ण महाभारत के युद्ध के पश्चात आराम कर रहे थे। तभी एक शिकारी द्वारा उनके तलवे में तीर से भेदन कर दिया गया। इसके उपरांत श्री कृष्ण भगवान देह त्याग कर वैकुंठधाम पधार गए।

10 किलोमीटर के विशाल क्षेत्रफल में फैले इस मंदिर में छोटे-बड़े कुल 42 मंदिर हैं और यहां पर 3 नदियां हिरण, सरस्वती और कपिला का अद्भुत संगम इस स्थान को अनुपम बनाता है। इस स्थान को पहले प्रभास क्षेत्र या प्रभास पाटन के नाम से भी जाना जाता था। वर्तमान समय में भी यह बेहद प्रसिद्ध तीर्थ स्थान के रूप में चर्चित है और यहां जाने के लिए आपको कई साधन उपलब्ध हैं।

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