India’s Women and Child Welfare minister Maneka Gandhi, works on a computer before an interview with Reuters at her office in New Delhi, India, October 19, 2015. India's main program to fight child malnutrition has been hit by budget cuts that make it difficult to pay wages of millions of health workers, a cabinet minister said on Monday in a rare public criticism of Prime Minister Narendra Modi's policies. Gandhi, the women and child welfare minister who oversees a scheme to feed more than 100 million poor people, said the current budget was only enough to pay salaries of her 2.7 million health workers until January. "We still have problems because our cut has still not been restored. Literally, it's a month-to-month suspense on whether we can meet wages," Gandhi told Reuters in an interview. To match interview INDIA-HEALTH/MALNUTRITION REUTERS/Adnan Abidi - RTS535X

गांधी परिवार राजनीति में हमेशा से चर्चित रहा है। तकनीकी रूप से इसकी दो धाराएं निकली हैं। इसकी एक मुख्यधारा जिसमें इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और राहुल गांधी तक आई है, उसने तो देश पर एक लंबे समय तक शासन किया ही है, इसके अतिरिक्त गांधी परिवार से छिटकी संजय गांधी की धर्मपत्नी मेनका गांधी भी भारतीय जनता पार्टी में काफी चर्चित रही हैं।

मेनका के बेटे वरुण गांधी भी राजनीति में खासे सक्रिय रहे हैं, परंतु मेनका गांधी के बारे में यह कहा जाता है कि संजय गांधी की मौत के बाद इंदिरा गांधी से उनका खासा मनमुटाव हो गया था और यह मनमुटाव इस कदर हुआ था कि इंदिरा गांधी ने उन्हें अपने घर तक से निकाल दिया था। वास्तव में यह कहानी क्या थी, आइए जानते हैं-

मेनका गांधी का जन्म 1956 में हुआ था और 1973 ईस्वी में उन्होंने लेडी श्री राम कॉलेज में ‘मिस लेडी’ नामक प्रतियोगिता जीत ली थी। जैसे ही मिस लेडी प्रतियोगिता उन्होंने जीती, तमाम मॉडलिंग कंपनियों के ऑफर उनके पास आए और दिल्ली क्लाथ मिल्स की एक तौलिया बनाने वाली कंपनी के लिए उन्होंने एक बिंदास विज्ञापन कर डाला। इस विज्ञापन की होर्डिंग्स दिल्ली में जगह-जगह स्थानों पर लगी थी और इसी विज्ञापन की होर्डिंग्स को देखकर संजय गांधी का दिल मेनका गांधी पर आ गया।

Pic: freejournal

वैसे संजय गांधी मेनका की कजन वीनू कपूर के दोस्त थे और वीनू की शादी के मौके पर ही संजय की मुलाकात मेनका से हुई। बस फिर क्या था दो प्रेमी पंछी बनकर हवा में उड़ने लगे और जल्द ही मुलाकातों का सिलसिला बढ़ते हुए शादी की बात पर आ खड़ा हुआ। कहा तो यहां तक जाता है कि संजय का जब हर्निया का आपरेशन हुआ, तो मेनका रोज कॉलेज से सीधे उन्हें देखने ही जाती थीं।

हालांकि इन दोनों की शादी को लेकर इंदिरा गांधी बहुत खुश नहीं थी लेकिन अपने बेटे के लिए उन्होंने इस शादी को मंजूरी दे दी थी। 29 सितंबर 1974 को संजय और मेनका की शादी हो गई। इंदिरा ने इस शादी में मेनका को 21 साड़ियां और दो गोल्ड सेट भी भेंट किए थे। संजय और मेनका को जल्द ही वरुण के रूप में एक बेटा भी हुआ।

सब कुछ ठीक चल रहा था कि 1980 में एक हवाई एक्सीडेंट में संजय गांधी की मृत्यु हो गई और यहीं से इंदिरा और मेनका के बीच मनमुटाव शुरू हो गया। कहा जाता है कि मेनका की मां से इंदिरा गांधी चिढ़ती थीं और संजय गाँधी के जाने के बाद इंदिरा चाहती थीं कि राजीव गांधी राजनीति में आयें, जबकि मेनका गांधी खुद राजनीति में अपनी मां के कहने पर आगे बढ़ना चाहती थीं।

पत्र-पत्रिकाएं भी इस तनाव के बीच आग में घी डालने काम करने लगी थीं और एक लेख में ‘मेनका को शेर पर सवार दुर्गा’ के रूप में जब छापा गया तो इंदिरा गांधी इससे नाराज हो गईं और असुरक्षा की भावना से भर गयीं। इसके बाद तो सास और बहू के बीच लगातार टकराहट होती रही। कहते हैं कुछ जगहों पर इंदिरा गांधी ने मेनका को भाषण देने से मना करने की भी कोशिश की लेकिन मेनका ने वहीं पर इंदिरा की इच्छा के विरुद्ध भाषण दिया।

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बस फिर क्या था इंदिरा गांधी ने मेनका को घर छोड़कर जाने का फरमान सुना डाला और घर छोड़ने के इस उपक्रम में तमाम मीडिया और प्रेस को भी गांधी परिवार के बीच हुई इस अनबन की भनक लग गई और तमाम चटकारे ले लेकर मीडिया ने इस मुद्दे को उठाया। कहते हैं इंदिरा गांधी के कार्यकाल का यह सबसे मुश्किल क्षण था।

हालांकि बाद में मेनका गांधी ने अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को दबाया नहीं और भारतीय जनता पार्टी के माध्यम से लगातार सांसद रहीं और केंद्र में मंत्री भी रहीं।

भारत के सबसे बड़े राजनीतिक परिवार की इस कहानी को आज भी याद किया जाता है।

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