आप इसे आश्चर्य मान सकते हैं! दुनिया में एक से बढ़कर एक अच्छे लोगों के अलावा दुनिया में एक से बढ़कर एक जालसाज भी हुए हैं। ऐसे लोगों की जालसाजी पूरी दुनिया में कुख्यात रही है और इन्हीं जालसाजों में एक नाम है नटवरलाल का!

जी हां! नटवरलाल की जालसाजी आप कुछ यूं समझ लीजिये कि उसने ना केवल ताजमहल को ही बेच डाला था बल्कि उसने संसद भवन और राष्ट्रपति भवन तक को बेचने का उपक्रम कर डाला था। आइए जानते हैं कि वह नटवरलाल कौन है और उसने ऐसा कैसे किया था?

नटवरलाल के बारे में कहा जाता है कि वह दूसरों की सिग्नेचर कॉपी करने में परफेक्ट था। साथ में उसने वकालत के पेशे से अपनी शुरुआत की थी, इस कारण झूठ बोलने में भी उसका कोई मुकाबला नहीं था। अपनी जालसाजी वाली सिग्नेचर करने की आदत के कारण ही उसने तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद के हस्ताक्षर करके संसद भवन को बेचने का कारनामा अंजाम दिया था। खास बात यह है कि देश के 8 राज्यों से अधिक में 100 से अधिक केस नटवरलाल पर दर्ज किए गए थे।

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ठीक इसी प्रकार से उसने ताजमहल को भी एक नहीं बल्कि 3 बार बेचने में सफलता प्राप्त कर ली थी। इन सबके अतिरिक्त, नटवरलाल के बारे में कुछ और कहानियां प्रचलित है जिन्हें जानना दिलचस्प रहेगा-

एक कहानी के अनुसार दिल्ली के कनॉट प्लेस में एक महँगी घड़ी की दुकान पर नटवरलाल गया और उसने बोला कि वह तत्कालीन वित्त मंत्री नारायण दत्त तिवारी का पीए है। क्योंकि राजीव गांधी उस वक्त परेशान थे इसलिए नटवरलाल ने इसका फायदा उठाते हुए दुकानदार को बोला कि राजीव गांधी अपने खराब राजनीतिक समय से मुक्ति पाने के लिए अपने मंत्रिमंडल के सभी सदस्यों को घड़ी गिफ्ट करना चाहते हैं। दुकानदार इसके लालच में आ गया और उसने नटवरलाल से पेमेंट की बात की तो पेमेंट ड्राफ्ट से होने की बात कह कर नटवरलाल ने दुकानदार को यकीन दिला दिया।

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नटवरलाल को नकली ड्राफ्ट बनाने में भला कितना समय लगता? और इस तरह वह बेहद महंगी और बेहतरीन घड़िया लेकर चंपत हो गया था।

इसी प्रकार वह कई बार जेल से भागने में भी सफल रहा। यहां तक कि एक बार तो 85 साल के आसपास की उम्र होने पर भी वह जेल से भाग निकला था। इन सब बातों से इतर नटवरलाल को गांव वाले रोबिन हुड की संज्ञा भी देते हैं और इसका कारण यह है कि पैसे लूट कर वह गरीबों में बांटता था। हालाँकि, यह कितना सच है, कितना झूठ इसकी तस्दीक करना मुश्किल है। दिलचस्प बात यह है कि नटवरलाल के ऊपर कई किताबें लिखी गई हैं और कई फिल्में भी बनी हैं।

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बहरहाल नटवरलाल की मृत्यु के बारे में 2 तारीख सामने आती है जिनमें से एक 1996 की है तो दूसरी 2009 की है। चाहे जब भी इनकी मृत्यु हुई हो लेकिन यह एक अटल सच्चाई है कि अपने जीते जी नटवरलाल के कारनामों ने उसका नाम इतिहास में जालसाज लोगों की सूची में सबसे ऊपर दर्ज कर दिया है।

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