भारतवर्ष में तमाम शहर हुए हैं और हर शहर की अपनी खासियत भी रही है। पर अगर बात करें लखनऊ की तो इसकी खास पहचान बड़े लंबे समय से मौजूद रही है। कोई इसे ‘अदब का शहर’ कहता है तो कोई इसे ‘नवाबों का शहर’। इस शहर ने कई हस्तियों को बनते और मिटते देखा है तो उनकी लाइफस्टाइल को भी करीब से महसूस किया है। आइए जानते हैं लखनऊ की कहानी

इस शहर की कहानी 1526 ईस्वी से ज्ञात है, जब पहली बार यहां हुमायूँ ने अपना साम्राज्य फैलाया। मुगल सल्तनत के अधीन आने के पश्चात अकबर के जमाने में लखनऊ फला फूला। कहते हैं शेख अब्दुल रहीम अब्दुल रहमान को लखनपुर जो बाद में लखनऊ बना और इसके आसपास के क्षेत्रों का जागीरदार बना दिया गया। शेख अब्दुल रहीम ने ही यहाँ मच्छी महल और दूसरे 5 महलों का निर्माण कराया था।

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इसी क्रम में 1722 ईस्वी में बुरहान उल मुल्क मीर मोहम्मद अवध के गवर्नर बने और शेख अब्दुल रहीम के वंशज शेख से युद्ध में उलझ गए पर बुरहान उल मुल्क मीर मोहम्मद इस युद्ध को जीत गए और यहीं से नवाबों का दौर शुरू हो गया। इसी दौर में कल्चर, आर्ट और अदब लखनऊ में पनपा और खासा फला- फुला भी। नवाबों का चौथा वंशज नवाब असफऊदौला पुराने लखनऊ को बचाने के लिए सर्वाधिक श्रेय लेने का अधिकारी है।

लखनऊ अपनी स्पीड से चलता रहा और 1764 ईस्वी में ब्रिटेन की ईस्ट इंडिया कंपनी बक्सर के युद्ध में मैदान में आ खड़ी हुई। नवाबों की राजनीति के बावजूद लखनऊ का साम्राज्य ईस्ट इंडिया कंपनी के हवाले हो गया, लेकिन नाम के ही सही नवाबों का शासन भी बना रहा।

इसी दौरान ईरान और इराक के शियाओं की तादाद भी लखनऊ में खासी बढ़ी। जाहिर तौर पर सिया-प्रवासियों ने लखनऊ को एक इंटेलीजेंट कल्चरल सेंटर के रूप में कन्वर्ट कर दिया। इसी समय के नवाब आसफ़ुद्दौला ने रूमी दरवाजा और बड़ा इमामबाड़ा बनवाया था। कहते हैं अंग्रेज जनरल क्लाउड मार्टिन इन जगहों को खरीदने के लिए बड़ी पेशकश तक कर चुके थे।

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बहरहाल 1798 ईस्वी में अंग्रेजों ने पूरी तरह से लखनऊ पर कब्जा कर लिया और आसफ़ुद्दौला के बेटे वजीर अली को लखनऊ का नवाब नहीं माना। इसके बाद नवाब पूरी तरह से अंग्रेजों के दया पर निर्भर हो गए थे और जैसे तैसे अपना कार्य निकाल रहे थे। हालाँकि 1847 ईस्वी में नवाब अमजद अली शाह गुजर गए और तब वाजिद अली शाह अवध के नवाब बने और यहीं से उन्होंने अंग्रेजों से बगावत शुरू कर दी।

उन्होंने अपनी सेना को मजबूत भी किया और परेड की सलामी भी लेते थे। तत्पश्चात अट्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति हुई और यहां से लखनऊ की कहानी बदलने लगी। इसी दौरान वाजिद अली शाह की पत्नी बेगम हजरत महल का नाम गूंजने लगा, बेगम ने अपने लड़के बिरजिस कद्र को अवध का नवाब बना दिया और नागरिकों के साथ अंग्रेजों के खिलाफ मैदान में उतर गयीं।

उन्होंने अंग्रेजों को हराया भी और आसपास के कई जिलों बहराइच, फैजाबाद, सीतापुर, सुल्तानपुर, गोंडा,,सलोन जैसे क्षेत्रों पर कब्जा भी किया। हालांकि अंग्रेजों ने बाद में लखनऊ पर कब्जा जमा लिया और 1857 की क्रांति की तरह लखनऊ में विद्रोह को उन्होंने दबा दिया। फिर आजादी की लड़ाई के साथ-साथ लखनऊ की कहानी भी चली और लाख जुल्म ढाने के बाद भी लखनऊ के अदब को कोई भी अंग्रेज दबा नहीं पाया। लखनऊ का कल्चर पूरी दुनिया में इसीलिए तो मशहूर है।

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