एक बालक जिसने किशोरावस्था की दहलीज पर कदम ही रखा था कि उसका नाम फरीद खां से ‘शेर खां’ पड़ गया! बाद में यही नाम शेरशाह बना। उसके नाम से ‘शेर’ शब्द क्यों जुड़ा, इसके पीछे भी दिलचस्प दास्तान है। कहते हैं उसने शिकार करते समय तलवार के बल पर अकेले ही शेर को मार गिराया था। यह खतरनाक कारनामा उसने किशोरावस्था में ही कर डाला था!

वैसे, शेरशाह का संबंध अफगान के पश्तून कम्युनिटी से था और तत्कालीन समय में शेरशाह के दादा इब्राहिम खान सूरी अपने बेटे के साथ भारत आकर रहने लगे थे। तब के समय में मुगल शासन भारत में अपने पांव जमाने में सफल हो गया था और शेर शाह के समय मुगल सल्तनत का दूसरा शासक हुमायूं दिल्ली की सल्तनत पर काबिज था।

शेरशाह के बचपन की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। कहते हैं कि शेर शाह के पिता की कई बीवियां थी और शेरशाह के घर में उससे सौतेला व्यवहार होता था। फरीद चूँकि सभी बच्चों में बड़ा था और जागीर का वारिस भी था। ऐसे में उसने अपनी महत्वाकांक्षा छिपाई भी नहीं और जवान होते होते वह खुद को बड़ी महत्वाकांक्षा से भर चुका था। घर में असंतोष का माहौल होने से उसके भीतर की चिंगारी और भी भड़क गई थी। कहते हैं कि 15 साल की उम्र में ही उसने अपने पिता का साथ छोड़ दिया और जौनपुर चला गया था।

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वह जमाल खान के यहां नौकरी करने लगा था पर यहां भी मन नहीं लगा और 1522 ईस्वी में बिहार के शासक बहार खां लोहानी के यहां वह नौकरी करने लगा था और अपनी मेहनत और सूझबूझ से उसने अपनी मालिक की नजरों में विशेष स्थान अर्जित कर लिया था।

बाद में बहार खां की मौत हो गई और शेर खां ने उसकी विधवा दूदू बेगम से ब्याह रचा लिया। कहते हैं उसने अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए इसे गुरु मंत्र बना लिया और कई विधवाओं से शादी करके उसने कई जागीरों पर कब्जा किया।

इस संबंध में चुनार के किले का जिक्र भी किया जाता है कि जब किले का कमानदार मरा तो उसके पुत्र की विधवा लार् मलिका से शेर खां ने विवाह करने के पश्चात चुनार के किले पर पूरा कब्जा जमा लिया।

1531 में हुमायूं ने चुनार किले पर डेरा जमा लिया था और शेर शाह उस वक्त हुमायूँ से जीतने की स्थिति में नहीं था, इसलिए उसने हुमायूं से समझौता कर लिया और जैसे तैसे मुगल नामक मुसीबत को तात्कालिक रूप से खुद से दूर करने में वह सफल रहा। बाद में उसकी महत्वाकांक्षी नजरें मुगल साम्राज्य पर भी टिक गयीं और इसके लिए वह बखूबी तैयारियां भी करने लगा।

उसने न केवल अपनी सैन्य ताकत बढ़ाई बल्कि अपने संसाधनों में भी अच्छी खासी बढ़ोतरी की। यह सारा कार्य शेरशाह मुगल सल्तनत को राजस्व देते हुए कर रहा था। बाद में उसने 1538 ईस्वी में बंगाल पर स्वेच्छा से आक्रमण करके मुग़ल साम्राज्य को राजस्व देना बंद कर दिया और फिर बंगाल के सूबेदार हुसैन शाही साम्राज्य का गयासुद्दीन महमूद शाह शेरशाह को राजस्व देने पर मजबूर हो गया।

बस यहां से हुमायूं की नजरों में शेरशाह खटक गया!

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दोनों की पहली बड़ी लड़ाई का अखाड़ा बना बिहार और हुमायूं की सेना जब बिहार में आ गई तो शेर खान ने मुगलों की कमजोरियों का बखूबी फायदा उठाया। मुगलों की कमजोरी शराब और शबाब थी और जब इसी के जश्न में मुगल सेना आराम फरमा रही थी, तभी बरसात के मौसम में शेर खां ने उन पर हमला कर दिया। जश्न में डूबे होने के कारण मुगल सैनिक ठीक से लड़ाई नहीं लड़ पाए और हुमायूं को बड़ी हार मिली। बड़ी मुश्किल से हुमायूं ने अपनी जान बचाई और 1540 ई. की इस लड़ाई के बाद शेर खां ने अपना नाम फरीद अल्दीन शेरशाह सूरी दर्ज कराना प्रारंभ कर दिया।

कहते हैं इसके बाद मुगल भागते रहे और शेर शाह से परास्त होने के बाद तकरीबन 15 साल तक हुमायूं भटकता रहा। शेरशाह सूरी के मौत के बाद ही कहीं मुगल शासन भारत में अस्तित्व में आ सका था। शेरशाह सूरी को भारत में विकास कार्य का भी श्रेय दिया जाता है। उसने लंबी-लंबी सड़कें बनवाई जिनमें भारत का मशहूर जीटी रोड भी शामिल है।

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