चाणक्य का नाम भला कौन नहीं जानता? वर्तमान समय में भी अगर कोई बड़ा अर्थशास्त्री होता है, कोई बड़ा राजनीतिज्ञ होता है तो उसे चाणक्य कह कर सम्मानित किया जाता है।

पर चाणक्य सिर्फ एक थे और अब तक उनके कद का भारतीय इतिहास में कोई दूजा व्यक्ति नहीं हुआ है और इसके पीछे ठोस कारण भी हैं। जिस प्रकार से एक सामान्य व्यक्ति को अत्याचारी शासन के खिलाफ खड़ा करके चाणक्य ने संपूर्ण भारत को एक सूत्र में पिरो दिया था, उसका अन्यत्र उदाहरण नहीं मिलता है। इसीलिए तो उन्हें विष्णुगुप्त, वात्स्यान, मल्ल्नाग, कौटिल्य इत्यादि नामों से भी पुकारा जाता है। आइए जानते हैं इस महान ऐतिहासिक नायक की कहानी को-

चाणक्य का जन्म ईसा से तकरीबन 350 वर्ष पूर्व तक्षशिला में हुआ था और इनके पिता चणक एक बड़े शिक्षक थे। इन के बचपन का नाम कौटिल्य रखा गया था। इनके पिता अपने राज्य की सुरक्षा-व्यवस्था के लिए चिंता प्रकट करते रहते थे।

Pic: thepolicy…

जाहिर तौर पर चणक तत्कालीन राजा धनानंद की भ्रष्ट नीतियों के खिलाफ थे और इसके लिए उन्होंने अपने मित्र अमात्य शकटार के साथ राजा के विरुद्ध एक योजना बना डाली। उन्होंने राजा को उखाड़ फेंकने की योजना बना ली लेकिन किसी तरह से धनानंद को इस योजना की भनक लग गई।

चणक को गिरफ्तार करके राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया और उनके सिर को काट कर मुख्य चौराहे पर लटका दिया गया था, ताकि कोई और इस प्रकार की गुस्ताखी न करे।
पिता को मिली इस सजा ने चाणक्य को गहरे तक झकझोर दिया। हालांकि अब कौटिल्य बेसहारा हो गए थे और किसी तरह से अपने आप को संभालते हुए उन्होंने अपने पिता का दाह-संस्कार किया और दाह संस्कार करते समय गंगाजल हाथ में लेकर उन्होंने शपथ खाई कि वह धनानंद के वंश का नाश कर देंगे, अन्यथा पका हुआ भोजन ग्रहण नहीं करेंगे। निश्चित रूप से यह राजद्रोह था लेकिन इसकी परवाह किसे थी!

इसके लिए वह अपना घर बार छोड़ कर जंगल की ओर चले गए और दौड़ते-भागते मूर्छित हो गए। मार्ग से जब एक संत गुजर रहे थे तब उन्होंने मूर्छित चाणक्य को देखा और उस बालक के मुख पर पानी डालकर उसे होश में लाया। होश में आने पर चाणक्य ने योजनाबद्ध तरीके से अपना नाम विष्णु गुप्त बताया, ताकि धनानंद को उनकी भनक न लगे। संत उन्हें अपने साथ ले गए और शिक्षा दीक्षा दी।

Pic: timesofindia

बाद में विष्णुगुप्त तक्षशिला के शिक्षक बन गए और उन्होंने काफी ख्याति प्राप्त कर ली। विष्णु गुप्त के नाम से वह प्रकांड विद्वान के रूप में मशहूर होते जा रहे थे।

उधर सिकंदर भारत की तरफ बढ़ता जा रहा था और भारत को कब्जा करने की उसकी नियत किसी से छिपी नहीं थी। यह स्थिति देखकर चाणक्य मगध गए और धनानंद के दरबार में सीधे पहुंच गए। वहां जाकर वह राजा को सिकंदर के प्रति आगाह करने की कोशिश करते हैं, लेकिन भोग-विलास में धनानंद इस कदर डूबा हुआ था कि उसने चाणक्य का ही अपमान कर दिया। चाणक्य को धक्का देकर दरबार से निकाल दिया जाता है और इन्हीं चाणक्य ने दोबारा प्रतिज्ञा ले ली कि अपनी शिखा को वह तब तक नहीं बांधेंगे, जब तक उनका बदला पूरा नहीं हो जाता है।

इसके लिए वह अपने पिता के मित्र अमात्य शकटार से मिले और उसने ही उन्हें धनानंद के दरबार में काम करने वाली मुरा नामक दासी के बारे में बताया। धनानंद ने उक्त दासी का भी अपमान किया था।

उस दासी के पुत्र का ही नाम चंद्रगुप्त मौर्य था। चाणक्य चंद्रगुप्त से मिलते हैं और उसकी मां को इस बात के प्रति आश्वस्त कर देते हैं कि चंद्रगुप्त एक राजा बनने योग्य राजकुमार है। चाणक्य फिर उसे शिक्षा देते हैं और धनानंद से बदला लेने के लिए प्रत्येक प्रकार से तैयार करते हैं। धर्म की सहायता से वात्सान मुनि बन कर चाणक्य लोगों को चंद्रगुप्त की सेना में जाने का सुझाव देते हैं और धीरे-धीरे चंद्रगुप्त एक मजबूत सेना तैयार कर लेते हैं। हालांकि बाद में अमात्य नामक गुप्तचर धनानंद को चाणक्य की साजिश के बारे में बताता है, लेकिन तब तक धनानंद पूरी तरह चक्रव्यूह में फंस गया होता है।

चंद्रगुप्त मगध पर आक्रमण कर देते हैं और धनानंद समेत उसके पूरे वंश को मौत के घाट उतार देते हैं और इस तरीके से चाणक्य का प्रतिशोध पूरा होता है।

Pic: wikipedia

बाद में चंद्रगुप्त ने प्रजा की देखभाल करने वाला एक शासन स्थापित किया जिसे आदर्श शासन के रूप में जाना जाता है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here