महान सम्राट अशोक को भला कौन नहीं जानता है! जिस प्रकार से अशोक ने कलिंग युद्ध के पश्चात शस्त्र त्याग कर बौद्ध धर्म का संपूर्ण विश्व में प्रचार-प्रसार किया, वैसा उदाहरण कहीं अन्यत्र नहीं मिलता। पर वास्तव में सम्राट अशोक की कहानी क्या है? आइए देखते हैं-

कहते हैं अशोक जितने मजबूत सम्राट थे, उतने ही नरम दिल इंसान और प्रेमी भी थे। राज्य में विभिन्न परिस्थितियों के उत्पन्न होने के पश्चात अशोक को सम्राट का पद भार संभालना पड़ा और इसमें जनता ने उनका पूरी तरह से सहयोग किया। मौर्य साम्राज्य की कीर्ति वैसे ही चारों ओर फैल रही थी, लेकिन सम्राट अशोक यह चाहते थे कि बेहद मजबूत पड़ोसी राज्य कलिंग उनके मौर्य साम्राज्य में मिल जाए। इसके पीछे खानदानी वजह भी थी।

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अशोक के दादा और उनके पिता बिंदुसार तक ने कलिंग को जीतने का भरपूर प्रयास किया था, लेकिन कई प्रयासों के बावजूद वह सफल नहीं हो सके थे। अतः बहाना ढूंढ कर 261 ईसा पूर्व में अशोक ने कलिंग पर आक्रमण कर दिया और भारी भरकम फौज के सहारे वह कलिंग का युद्ध जीतने में सफल भी रहे।

हालांकि यहाँ से सम्राट अशोक का जीवन बदल जाना था और वैसा ही हुआ। जैसे महाभारत की युद्ध भूमि में पहुंचते ही अर्जुन को विरक्ति का एहसास होने लगा था, ठीक उसी प्रकार युद्ध के पश्चात अशोक को लाशों के ढेर देखकर विरक्ति का भाव आने लगा था। वह बार-बार सोच रहे थे कि एक राज्य को जीतने के लिए उन्होंने हजारों-लाखो लोगों को किस प्रकार क़त्ल कर दिया? अशोक के अन्दर यह भावना बढती गयी और शांति की तलाश में वह व्याकुल हो उठे थे। जाहिर तौर पर यह जीत उन्हें शांति नहीं दे सकी थी और यहाँ से एक नए अशोक का जन्म होना था।

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कहते हैं इस युद्ध से पहले ही अशोक विदिशा की एक साधारण राजकुमारी से प्रेम और विवाह के बंधन में बंध चुके थे, किंतु उनकी प्रेमिका देवी अहिंसा के मार्ग पर चल रही थीं, इसलिए वह अशोक के साथ रहने कभी नहीं आईं। हालांकि अशोक अपनी पत्नी और बच्चों से मिलने विदिशा आते रहे थे। हिंसा और अहिंसा को लेकर अक्सर अशोक और देवी के बीच में वाद-विवाद भी होते रहते थे। अशोक जहां शासन के लिए हिंसा को आवश्यक मानते थे वहीं देवी हमेशा अपने अहिंसा के सिद्धांत पर टिकी रहती थीं, किंतु कलिंग युद्ध के बाद जब अशोक विरक्त हो गए तब उन्होंने शांति के लिए देवी के पास लौटने का निर्णय लिया।

तत्पश्चात अशोक अपने राज सिंहासन पर नहीं बैठे और बौद्ध धर्म के साथ उसका अहिंसात्मक सिद्धांत स्वीकार कर लिया। देवी ने भी कभी राज्य की लालसा नहीं की और अपने बच्चों को अहिंसक रूप से जंगलों में ही पाला था। देवी दुनिया से गुजर चुकी थीं और उनके बच्चे महेंद्र और संघमित्रा श्रीलंका में बौद्ध धर्म के प्रचार हेतु बस गए थे।

जाहिर तौर पर अशोक को कहीं भी शांति नहीं मिल रही थी, इसीलिए उन्होंने बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए स्तूप का निर्माण कराया। इस तरीके से अपनी यात्रा पर चलते हुए संपूर्ण विश्व में अशोक ने भी बुद्धम शरणम गच्छामि का मार्ग चुना और अपने जीवन को सार्थक करने का भरपूर प्रयत्न किया।

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दुनिया में ऐसे उदाहरण बिरले हैं, जब एक सम्राट सब कुछ छोड़कर धर्म के मार्ग पर बढे और सम्राट अशोक ऐसे ही उदाहरणों में गिने जाते रहेंगे।

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