इतिहास में एक से बढ़कर एक ऐसी घटनाएं दर्ज हैं, जिन पर कभी-कभी यकीन करना मुश्किल हो जाता है। भारत कितना शौर्यशाली था और आखिर भारत के पास क्या नहीं था, यह महसूस कर आप चौंक उठेंगे। धन संपदा से लेकर ज्ञान और प्रेम से लेकर शांति संदेश तक भारत द्वारा संपूर्ण विश्व को दिए गए तोहफे हैं।

वर्तमान में ‘कोहिनूर’ हीरा विश्व के सर्वाधिक प्रसिद्ध हीरों में गिना जाता है। यह बात हम सबको पता ही है यह हीरा मूल रूप से भारत की संपत्ति रहा है। इसको अंग्रेजों द्वारा लूट कर अपने देश ले जाया गया, पर असली हीरे की कहानी क्या है आइए जानते हैं।

इतिहासकार बताते हैं कि यह हीरा भारत के आंध्र प्रदेश में स्थित गोलकुंडा खनन एरिया से प्राप्त हुआ था। विश्व के सर्वाधिक कीमती हीरों में इसका नाम शामिल होना तो इसकी एक उपलब्धि है ही, साथ ही इस हीरे से एक ऐसा अंधविश्वास भी जुड़ा हुआ है जो अपने आप में रोचक है।

किंतु इस कथा पर आगे बढ़ने से पहले इस हीरे के बारे में कुछ जान लेना बेहतर रहेगा।

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यह हीरा मूल रूप से 793 कैरेट का है और वर्तमान में ब्रिटेन के राजपरिवार के पास रखा हुआ है। इसके अतिरिक्त कई बार लोगों के मन में प्रश्न उठता है कि ”कोहिनूर” शब्द का अर्थ क्या है? तो आपको बता दें कि कोहिनूर का मतलब होता है ‘रोशनी का पहाड़’ या फिर कई बार इसे ‘रोशनी की श्रृंखला’ से संदर्भित किया जाता है।

5000 सालों से अधिक पुराने इस हीरे पर कई देश दावा ठोकते हैं। यह भी कहा जाता है कि महाभारत काल में जिस ‘स्यमंतक मणि’ का जिक्र आया है, असल में वह कोहिनूर हीरा ही है। हालांकि इस पर विद्वानों के विभिन्न मत हैं, पर ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो 1304 ईस्वी तक इस हीरे को मालवा के सम्राट की देखरेख में रखा गया था।

बाद में समरकंद के नगर में यह 300 साल तक सुरक्षित रखा गया था। 1306 के दौरान इस हीरे के संबंध में एक अंधविश्वास बड़ी तेजी से फैला, जिसके अनुसार अगर कोई आदमी इस हीरे को धारण करता है तो वह तमाम सुख-सुविधाओं से युक्त तो रहेगा लेकिन वास्तव में वह कभी सुखी नहीं रह पाएगा।

मतलब वह तमाम रोगों दोषों से घिर जाएगा। यह अंधविश्वास सिर्फ पुरुषों को लेकर है अर्थात महिलाएं या कोई देवता इस हीरे को धारण कर सकते हैं।

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इतिहास की बात करें तो 14वीं शताब्दी में अलाउद्दीन खिलजी के पास यह हीरा रखा था तो बाबर ने भी इस हीरे का जिक्र अपनी किताब ‘बाबरनामा’ में किया है। पानीपत की लड़ाई के बाद ग्वालियर के सम्राट द्वारा हुमायूं को यह हीरा गिफ्ट किया गया था। बाद में हुमायूं ने ही इसे बाबर को गिफ्ट किया गया था और इसे ‘बाबर का हीरा’ कह कर संबोधित किया गया।

17वीं शताब्दी में शाहजहां के मयूर सिंहासन में इस हीरे को जड़ा गया था। इतना ही नहीं, अपने सफर के दौरान घटते-घटते कोहिनूर मात्र 186 कैरेट का ही रह गया था। औरंगजेब के पोते ‘मोहम्मद शाह’ के पास जब यह हीरा आया तो उसके बाद 1740 ईस्वी में ईरान के शासक नादिरशाह द्वारा भारत पर आक्रमण किया गया था। तब नादिर शाह ने इस हीरे को प्राप्त किया और उनके द्वारा ही इसे कोहिनूर नाम दिया गया।

बाद में नादिरशाह की हत्या हो गई और उनके जनरल ‘अहमद शाह दुर्रानी’ द्वारा इस हीरे पर कब्जा कर लिया गया। 1813 ई. में अहमदशाह के वंशज ‘शाह राजा दुर्रानी’ द्वारा इस हीरे को सिख समुदाय के संस्थापक महाराणा ‘रंजीत सिंह’ को गिफ्ट कर दिया गया। इसी हीरे के बदले महाराणा रंजीत सिंह द्वारा ‘शाह शुजा’ को अफगानिस्तान की राजगद्दी वापस पाने में मदद की गई थी।

बाद में 1849 ई. में एंग्लो सिख युद्ध में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा इस हीरे पर कब्जा कर लिया गया और 1852 ई. में डच के जौहरी ‘मिस्टर ‘कैंटॉर’ को इस हीरे को चमकदार बनाने का ठेका दिया गया। बाद में यह महारानी विक्टोरिया के ताज में जोड़ दिया गया और यही हीरा आज भी ब्रिटेन की महारानीयों द्वारा पहना जाता है।

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कोहिनूर जड़े ताज को लंदन के टेम्स नदी किनारे बने एक विशाल किले में सिक्योरिटी के साथ रखा गया है। भारत सरकार द्वारा इस हीरे को वापस लाने की कोशिश शुरू की गई थी, हालांकि ब्रिटिश सरकार ने भारत के दावे को मान्यता नहीं दी। ना केवल भारत, बल्कि पाकिस्तान द्वारा भी इस हीरो को वापस पाने की कोशिश की गई।

समझना मुश्किल नहीं है कि इस प्राचीन हीरे का ऐतिहासिक रूप से कितना महत्व है। लेकिन जिस प्रकार से भारत की तमाम संपत्तियों पर अंग्रेजों ने कब्जा किया हुआ है, ठीक उसी प्रकार हीरे पर भी उनका कब्जा भारतीयों को खलता रहता है। पर इस गौरवशाली हीरे से भारत का इतिहास इस कदर जुड़ा हुआ है कि उसकी मान्यता को संभवत कोई भी खारिज नहीं कर सकता है।

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