इतिहास में हमेशा अच्छी यादें ही नहीं रहती हैं बल्कि इसमें एक से बढ़कर एक ऐसी यादें भी समाहित होती हैं जिन्हें लोग याद नहीं करना चाहते! कुछ ऐसा ही हाल भारत में नक्सलवाद का भी रहा है। तमाम राज्यों के कई जिलों में नक्सलवाद ने भारतीय गणतंत्र को बहुत नुकसान पहुंचाया है। किस प्रकार से समाज के असामाजिक लोग पिछड़ों, आदिवासियों को बरगला कर प्रशासन के खिलाफ खड़ा कर देते हैं इसका नक्सलवाद से बढ़कर कोई दूसरा उदाहरण नहीं हो सकता है।

ऐसे ही जब छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद चरम पर पहुंचने लगा, तो वहां के शरीफ लोगों ने भी नक्सलियों के खिलाफ बंदूके उठा लीं और ‘खून का बदला खून’ से लिया जाने लगा। इसी को ‘सलवा जुडूम’ के नाम से जाना गया। आइए जानते हैं इससे जुड़ी दूसरी बातें

बात 2005 की है। सरकार और अर्धसैनिक बल नक्सलियों के आगे पस्त हो रहे थे और तभी आम आदमियों ने दंतेवाड़ा में नक्सलियों के खिलाफ हथियार उठा लिया। इस सलवा जुडूम में तकरीबन 200 गांव के लोगों ने हिस्सा लिया। आश्चर्य की बात यह है कि सलवा जुडूम का शाब्दिक अर्थ होता है ‘शांति का कारवां’।

Pic: galli

सलवा जुडूम के नायक माने जाते हैं कांग्रेस के नेता रहे महेंद्र कर्मा। इन्हें ‘बस्तर का टाइगर’ के नाम से भी जाना गया। महेंद्र कर्मा इसी क्षेत्र के रहने वाले थे और यहां की समस्याओं से भली-भांति परिचित भी थे। पहले सलवा जुडूम अहिंसात्मक रूप से शुरू हुआ, लेकिन बाद में लोगों के पास तलवारों से लेकर बंदूक तक पहुंचा दी गई और उन्हें बकायदा वर्दी पहना कर लड़ाई में झोंक दिया गया।

उन लोगों को पैसे भी मिल रहा था और यह सारा संगठन चल रहा था केवल महेंद्र कर्मा के बल पर! कई लोग यह भी कहते हैं कि सलवा जुडूम को सरकार का भी समर्थन प्राप्त था और इसमें पुलिस ने गांव वालों को मुखबिरी करने से लड़ाई करने तक की संभवत ट्रेनिंग भी दी थी, और इसके बदले उन्हें अनऑफिशियल तौर पर कुछ पैसे तक दिए जाते थे।

इस अभियान को कुछेक सफलता भी हाथ लगी और कई नक्सलियों का एनकाउंटर करने में पुलिस सफल हुई।

नक्सलियों में सलवा जुडूम का अच्छा खासा खौफ बैठ गया था उन्होंने भी पलटवार की कार्रवाई की और 2006 में द्रुपाल नामक जगह पर 30 सलवा जुडूम समर्थकों को ब्लास्ट से उड़ा दिया गया। इसके बाद हिंसा और तेज हो गई और आदिवासियों का पलायन शुरू हो गया। सुप्रीम कोर्ट तक में केस दायर हो गया और 2008 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर यह अभियान बंद कर दिया गया। जाहिर तौर पर इससे महेंद्र कर्मा का रुतबा काफी हद तक घट गया था और वो चुनाव भी हार चुके थे।

इसके बाद तो नक्सलियों ने एक-एक करके कई सालवा जुडूम के नेताओं को टारगेट बनाया और मारा भी। इसके बाद महेंद्र कर्मा को जेड प्लस सुरक्षा प्रदान की गयी थी, इसीलिए वह कई बार बचते रहे लेकिन 25 मई 2013 को नक्सलियों ने उन्हें एक बड़े हमले में मार डाला। साथ ही उनके 23 और समर्थकों को भी मार डाला गया।

कहते हैं इतिहास बड़ा क्रूर होता है और उसमें दर्दनाक घटनाएं बहुत कुछ सिखलाती हैं। नक्सलियों का आतंक और सलवा जुडूम की उत्पत्ति में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला और यह इतिहास में दर्ज हो गया।

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