भारत को स्वतंत्रता मिलने में न जाने कितने वीरों ने अपने प्राण गंवा दिए और न जाने कितने आंदोलनों में समाज ने अपने आप को झोंक दिया। ऐसा ही एक आंदोलन था ‘नील-विद्रोह’। नील-विद्रोह गरीब किसानों का अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बड़ा आंदोलन था। आइए जानते हैं इस विद्रोह के बारे में

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जैसा कि हम सबको पता ही है कि अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी 18 वीं शताब्दी तक भारत में अपना पैर जमा चुकी थी। इसी शताब्दी में वह नील की खेती और अफीम की खेती पर बेहद जोर दे रही थी। बताते चलें कि नील का प्रयोग छपाई में ज्यादा किया जाता था, इसीलिए इसकी डिमांड भी काफी होने लगी थी।

नील की खेती के लिए बंगाल, बिहार जैसे राज्य ज्यादा मुफीद समझे जाते थे। बंगाल से बनने वाली उच्च क्वालिटी की नील ब्रिटेन भेजी जाती थी और 1810 ईस्वी तक भारत से एक बड़ा हिस्सा ब्रिटेन भेजा जाने लगा, जो इसकी खपत का कुल 95% था। जबकि पहले मात्र 30% हिस्सा ही भारत से जाता था।

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि कई ब्रिटिश अधिकारियों और बिजनेसमैन ने नील की खेती पर फोकस करने के लिए अपने दूसरे व्यापार और नौकरियां तक छोड़ दी थीं। और यहां से शुरू हुआ इंडियन फार्मर्स और रैयतों पर अत्याचार।

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ज्यादा से ज्यादा प्रॉफिट कमाने के लिए अंग्रेज लोगों को सस्ते मजदूरों की आवश्यकता थी और इसके लिए 2 तरीके अपनाये गये। नील की बागानों के मालिक बड़ी संख्या में मजदूर लगाकर, उन पर अत्याचार करके खुद नील की खेती करते थे। चूंकि जमींदार होने के कारण तमाम किसानों पर उनका नियंत्रण था और अंततः यहां का प्रोडक्शन अंग्रेजों के हवाले किया जाता था।

दूसरा तरीका यह था कि खुद अंग्रेज व्यापारी और अधिकारी रैयतों / जमीदारों से जबरदस्ती उनकी जमीन लीज पर ले लेते थे और इसमें वह भारतीय मजदूरों को काम पर लगा कर जबरदस्त प्रॉफिट बनाते थे। जाहिर तौर पर भारतीय किसानों, मजदूरों और जमीदारों तक का शोषण होने लगा और वह कर्ज के जाल में दबते चले गए।

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बस फिर क्या था बगावत की पृष्ठभूमि तैयार हो गई और 1859 में जमींदारों और किसानों ने नील की खेती करने से ही मना कर दिया। 1858 में बंगाल के नदिया डिस्ट्रिक्ट के गोविंदपुर गांव में वहां के लोकल लीडर दिगंबर विश्वास और विष्णु विश्वास ने सबसे पहले आन्दोलन स्टार्ट किया और धीरे-धीरे यह पूरा बंगाल में फैल गया।

किसानों, मजदूरों ने नील की फैक्ट्रियों पर हमला करना शुरू कर दिया और इसमें न केवल पुरुष बल्कि महिलाएं भी शामिल थीं। जमींदारों के साथ ने इस विद्रोह का दायरा काफी बड़ा कर दिया। हाल ही में अट्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति समाप्त हुई थी और इस आंदोलन के उभार ने ब्रिटिश हुकूमत में डर पैदा कर दिया और वह एन केन प्रकारेण आंदोलन को दबाने के प्रयास करने लगी।

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यहां तक कि बागान मालिकों की सुरक्षा के लिए ब्रिटिश हुकूमत ने सेना तक तैनात किया और बंगाल में एक तरह से नील की खेती ध्वस्त हो गई। बाद में ब्रिटिश अधिकारियों ने बिहार के किसानों की तरफ नील की खेती के लिए रुख करना शुरू कर दिया लेकिन 1917 में महात्मा गांधी ने चंपारण आंदोलन शुरू करके अंग्रेजों की मंशा पर पानी फेर दिया।

ज़ाहिर तौर पर भारतवर्ष में हुए बड़े आंदोलनों में नील विद्रोह का नाम लिया जाता है, क्योंकि इसने पूरी ब्रितानी हुकूमत को सिर के बल खड़ा कर दिया था। यहां तक की ब्रिटेन में बैठी महारानी विक्टोरिया तक इस विद्रोह की खबर फैल गयी थी और इसी दबाव के फल स्वरुप ब्रिटिश मजिस्ट्रेट को नोटिस जारी करना पड़ा कि रैयतों को अनुबंध मानने पर विवश नहीं किया जा सकता। जाहिर तौर पर एक तरह से यह ब्रिटिश हुकूमत का झुकना ही था।

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